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चंडीगढ़। पंजाब में आई विनाशकारी बाढ़ ने राज्य की हरी चादर को बर्बाद कर दिया है। वन एवं वन्यजीव संरक्षण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 776 हेक्टेयर क्षेत्रफल में करीब 4,94,956 पेड़ बाढ़ की भेंट चढ़ गए हैं। यह नुकसान पिछले 37 सालों में सबसे भीषण माना जा रहा है। पंजाब में महज 1,846 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का केवल 3.7प्रतिशत है। लगभग 83 प्रतिशत ज़मीन खेती के अंतर्गत होने के कारण पहले से ही जंगल बढ़ाने की गुंजाइश बेहद कम है। ऐसे में लाखों पेड़ों का एक साथ बह जाना पंजाब की पर्यावरणीय स्थिति को दशकों पीछे धकेल सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत राज्य वन रिपोर्ट में बताया गया है कि वन विभाग ने अब तक का नुकसान करीब 341.3 लाख रुपये आंका है, जबकि विभागीय इमारतों को हुआ 19.2 लाख रुपये का अतिरिक्त नुकसान मिलाकर कुल नुकसान 360.5 लाख रुपये से अधिक बैठता है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधान मुख्य वन संरक्षक धर्मेंद्र शर्मा ने कहा कि ये शुरुआती आंकड़े हैं, बाढ़ का पानी उतरने के बाद स्थिति और भयावह हो सकती है। उन्होंने आश्वासन दिया कि हालात सुधरने पर हरे-भरे आवरण को फिर से पटरी पर लाने की विस्तृत योजना तैयार की जाएगी।
इस बीच, बाढ़ का मानव जीवन पर भी कहर जारी है। पंजाब में शुक्रवार और शनिवार के बीच तीन और लोगों की मौत हुई, जिससे यहां मृतकों का आंकड़ा 46 तक पहुंच गया। 48 नए गांव बाढ़ के खतरे में बताए जा रहे हैं। हरियाणा के अंबाला जिले में तंगड़ी नदी में डूबकर 13 वर्षीय बच्चे की मौत ने स्थिति की भयावहता और स्पष्ट कर दी। विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब पहले ही देश के उन राज्यों में शामिल है जहां वन क्षेत्र सबसे कम है, और अब बाढ़ ने राज्य सरकार की पौधारोपण योजनाओं को गहरी चोट पहुंचाई है। इसका असर पर्यावरणीय संतुलन बहाल करने की कोशिशों पर लंबे समय तक पड़ेगा। वहीं हिमाचल प्रदेश में हालात और भी गंभीर हैं। यहां अब तक 366 लोगों की मौत हो चुकी है और 41 लोग अब भी लापता हैं। कुल्लू में भूस्खलन के मलबे में दो लापता व्यक्तियों की तलाश तीसरे दिन भी जारी रही। हालांकि मौसम में कुछ सुधार हुआ है, जिससे राहत और बचाव कार्यों में तेजी आई है। पंजाब और हिमाचल में प्रकृति का यह कहर साफ संकेत देता है कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने की कितनी बड़ी कीमत इंसानों और प्रकृति दोनों को चुकानी पड़ रही है।

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