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इंडियन मेडिकल डिग्री एक्ट, 1916 के प्रावधानों का उल्लंघन

नई दिल्ली। फिजियोथेरेपिस्ट को अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’शब्द लिखने का अधिकार नहीं है और केवल रजिस्टर्ड डॉक्टर ही इस उपाधि का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस आशय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस) ने एक दिशानिर्देश जारी किए हैं। डीजीएचएस की डॉ. सुनीता शर्मा ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अध्यक्ष डॉ. दिलीप भानुशाली को लिखे पत्र में कहा कि डीजीएचएस को फिजियोथेरेपिस्ट के अपने नाम के आगे ‘डॉ.’ और पीछे ‘पीटी’ लगाए जाने के सिलसिले में इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन (आईएपीएमआर) सहित विभिन्न संगठनों से कई ज्ञापन और आपत्तियां हासिल हुई हैं। पत्र के मुताबिक, आईएपीएमआर ने सूचित किया है कि यह मुद्दा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग (एनसीएएचपी) की ओर से 23 मार्च को प्रकाशित फिजियोथेरेपी के लिए अनुमोदित योग्यता आधारित पाठ्यक्रम (पृष्ठ 34, बिंदु संख्या 3.2.3) से उपजा है।पत्र में कहा गया है, “इस तरह रिकमंडेड टाइटल फिजियोथेरेपिस्ट के नाम के आगे ‘डॉ.’ और पीछे ‘पीटी का इस्तेमाल है।
पत्र में कहा गया है कि परिषद ने निर्णय लिया था कि नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ सहित मेडिकल प्रोफेशन की किसी अन्य श्रेणी को इस उपाधि का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं है। इसमें कहा गया है कि परिषद ने एक कानूनी राय भी ली थी, जिसमें कहा गया था कि अगर कोई भी फिजियोथेरेपिस्ट, बिना किसी मान्यता प्राप्त मेडिकल क्वालिफिकेशन के, ‘डॉ.’ की उपाधि का इस्तेमाल करता है, तो वह इंडियन मेडिकल डिग्री एक्ट, 1916 के प्रावधानों का उल्लंघन करेगा। पत्र के अनुसार, इस तरह के उल्लंघन पर अधिनियम की धारा 6 और 6ए के खिलाफ कृत्य के लिए धारा 7 के तहत कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कुछ अहम फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें पटना हाईकोर्ट का 2003 का आदेश भी शामिल है, जिसमें कहा गया था कि जब तक फिजियोथेरेपिस्ट राज्य चिकित्सा रजिस्टर में दर्ज नहीं हो जाते, वे आधुनिक चिकित्सा पद्धति का अभ्यास नहीं कर सकते या अपने नाम के आगे ‘डॉ.’ शब्द नहीं लगा सकते। पत्र में कहा गया है कि तमिलनाडु मेडिकल काउंसिल की ओर से 2016 में जारी परामर्श में भी फिजियोथेरेपिस्ट को अपने नाम के आगे ‘डॉ.’ शब्द का इस्तेमाल करने के खिलाफ चेतावनी दी गई है और उन्हें ‘पैरामेडिक’या ‘टेक्नीशियन’बताया गया है। इसमें बेंगलुरु की एक अदालत के साल 2020 के एक फैसले का जिक्र किया गया है, जिसके तहत फिजियोथेरेपिस्ट या ‘ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट’के ‘डॉ.’ उपाधि का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी गई थी और इस बात पर जोर दिया था कि उन्हें डॉक्टर की देखरेख में काम करना होगा। पत्र में कहा गया है कि मद्रास हाईकोर्ट ने 2022 में फिजियोथेरेपिस्ट के अपने नाम के आगे ‘डॉ.’ शब्द का इस्तेमाल करने पर लगाए गए प्रतिबंध को बरकरार रखा था और दोहराया था कि आईएमसी एक्ट के तहत उन्हें ‘डॉक्टर के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। इसमें कहा गया है कि यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि पैरामेडिकल और फिजियोथेरेपी केंद्रीय परिषद विधेयक, 2007 की परिषद की आचार समिति ने पहले फैसला किया था कि केवल आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी के रजिस्टर्ड डॉक्टर ही ‘डॉ.’ उपाधि का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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