
नई दिल्ली। देश के चीफ जस्टिस बीआर गवई ने भारत में कानून के शासन की बात कही। उन्होंने मॉरीशस विश्वविद्यालय के सर मौरिस रॉल्ट मेमोरियल लेक्चर के दौरान गुलामी और जनजातियों को निशाना बनाने वाले औपनिवेशिक कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा, ‘केवल किसी कानून लीगल कर देने से निष्पक्षता या न्याय प्रदान नहीं हो जाता है। यह याद रखना ज़रूरी है कि किसी चीज को वैध बना देने का मतलब यह नहीं कि वह न्यायसंगत है। इतिहास इस दर्दनाक सच्चाई के अनगिनत उदाहरण हैं। लोकतंत्र का मतलब कानून को अपने मन की शक्ति बनाने के बजाय न्याय प्रदान करना होता है। अपने संबोधन में बीआर गवई ने ‘सबसे बड़े लोकतंत्र में कानून का शासन’ विषय पर अपना व्यख्यान दिया।अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय संवैधानिक यात्रा की भी बात की।
उन्होंने महात्मा गांधी के ताबीज़ और डॉ बीआर अंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि को शासन के नैतिक दिशासूचक के रूप बताया। उन्होंने कहा, ‘कानून का शासन केवल नियमों का समूह नहीं है। यह एक नैतिक और मोरल फ्रेमवर्क का डिजाइन है, जिसे समानता बनाए रखने, मानवीय गरिमा की रक्षा करने और एक विविध एवं जटिल समाज में शासन का मार्गदर्शन करने के लिए डिजाइन किया गया है।मुख्य न्यायाधीश गवई ने अवैध तोड़फोड़ पर अपने ही 2024 के फैसले की भी चर्चा किया। जिसे
‘बुलडोजर केस’ के नाम से जाना जाता है। कोर्ट ने सरकारी फैसले जिसमें दंड के रूप में अभियुक्तों के घरों को ध्वस्त करने में कार्यपालिका के अतिक्रमण के विरुद्ध सुरक्षा उपाय निर्धारित किए थे। इस फैसले के बारे में बात करते हुए, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि कार्यपालिका एक साथ न्यायपालिका, जूरी और जल्लाद की भूमिकाएं नहीं निभा सकती। चीफ जस्टिस ने कहा, ‘इस फैसले में एक स्पष्ट संदेश दिया गया है कि भारतीय न्याय व्यवस्था कानून के शासन से चलती है, बुलडोजर के शासन से नहीं।’ उन्होंने इस बात पर जो दिया कि सत्ता का प्रयोग निष्पक्ष रूप से किया जाए, न कि प्रतिशोध के साधन के रूप में।अपने भाषण की शुरुआत से पहले चीफ जस्टिस गवई ने मॉरीशस के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सर मौरिस रॉल्ट को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने उनको प्रख्यात न्यायविद बताया।
