
नोटिस देकर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश के करीब 4.5 लाख विचाराधीन कैदियों को मतदान का अधिकार देने की मांग पर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। शुक्रवार को मामले पर एक जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई करते हुए अदालत ने दोनों पक्षों को नोटिस दे दिया।
याचिका पंजाब के पटियाला की सुनीता शर्मा ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि जिन कैदियों को अब तक किसी अपराध में दोषी नहीं माना गया है, यानी जिनका मुकदमा लंबित है, उन्हें वोट देने से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण की दलीलें सुनीं। भूषण ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) के तहत सभी कैदियों को मतदान से वंचित करना “अनुचित और असंवैधानिक” है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जो लोग अभी सजा पाए बिना जेल में हैं, वे “निर्दोष माने जाते हैं” और उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार (कानून और न्याय मंत्रालय) और चुनाव आयोग से कहा कि वे इस मुद्दे पर अपना पक्ष चार सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करें। फिलहाल, मौजूदा कानून के तहत किसी भी जेल में बंद व्यक्ति चाहे वह दोषी हो या विचाराधीन कैदी को मतदान करने की अनुमति नहीं है। केवल पुलिस हिरासत में या अस्थायी रूप से जेल के बाहर रहने वाले आरोपी वोट डाल सकते हैं।
