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जहां पुनर्मिलन की कोई संभावना नहीं, वहां सिर्फ प्रक्रिया के लिए दंपती को इंतजार करवाना न्याय के हित में नहीं
अहमदाबाद | तलाक से जुड़े मामलों में गुजरात हाईकोर्ट से एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सामने आया है। परस्पर सहमति से तलाक लेने वाले दंपतियों को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानून में निर्धारित 6 महीने का वेटिंग या कूलिंग पीरियड हर हाल में अनिवार्य नहीं है। यदि पति-पत्नी के बीच सुलह या पुनर्मिलन की कोई संभावना नहीं हो, तो अदालत इस कूलिंग पीरियड को माफ कर सकती है। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुका हो और साथ रहने की कोई संभावना न बची हो, वहां केवल कानूनी औपचारिकता के नाम पर दंपति को लंबे समय तक इंतजार करवाना न्याय के हित में नहीं है। कानून का उद्देश्य लोगों को मानसिक तनाव में डालना नहीं, बल्कि उन्हें न्याय प्रदान करना है।
यह मामला एक ऐसे दंपति से जुड़ा है, जिनका विवाह वर्ष 2023 में हुआ था। विवाह के कुछ ही समय बाद दोनों के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए और दोनों ने परस्पर सहमति से तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन किया। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने कानून में उल्लेखित कूलिंग पीरियड का हवाला देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी। फैमिली कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ दंपति ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। इस मामले में पत्नी की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता पूजा बसवाल ने बताया कि फैमिली कोर्ट ने केवल इस आधार पर तलाक की याचिका खारिज की थी कि 6 महीने के कूलिंग पीरियड को माफ करने के लिए आवेदन नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया कि पति-पत्नी पिछले एक वर्ष से अलग रह रहे हैं, दोनों युवा हैं, उनके बीच भविष्य में साथ रहने की कोई संभावना नहीं है, कोई संतान नहीं है और पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता भी मिल चुका है। ऐसे हालात में केवल तकनीकी औपचारिकताओं के कारण तलाक से इनकार करना उचित नहीं है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह मामले पर नए सिरे से विचार करे और कूलिंग पीरियड माफ किए जाने की संभावना को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले।
उल्लेखनीय है कि इस फैसले का भविष्य में व्यापक प्रभाव पड़ेगा। यह परस्पर सहमति से तलाक लेने वाले दंपतियों के लिए मार्गदर्शक बनेगा, फैमिली कोर्टों को अधिक व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा और अनावश्यक कानूनी देरी को कम करने में सहायक होगा। कुल मिलाकर, गुजरात हाईकोर्ट का यह फैसला तलाक कानून में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दिशा दर्शाता है, जिसमें कानून के साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता को भी समान महत्व दिया गया है।

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