
लगातार वन क्षेत्रों में अवैध निर्माण, अतिक्रमण के चलते विभाग ने लगाई रोक
भोपाल। चारों दिशाओं में धड़ल्ले से कॉलोनियां काटने के साथ-साथ फार्म हाउस आदि निर्माण प्रदेश में हो रहे हैं। अब वन विभाग ने तय किया है कि राजस्व विभाग के समन्वय स्थापित कर वन सीमा से लगे क्षेत्रों में नई कॉलोनियों को विकसित करने, फॉर्म हाउस या अन्य किसी भी तरह के निर्माण से पहले वन विभाग की फॉरेस्ट एनओसी अनिवार्य रहेगी। अभी महू क्षेत्र में इस तरह के अवैध निर्माण, अतिक्रमण की सर्वाधिक शिकायतें सामने आई है। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर वन सीमा में अवैध उत्खनन भी हो रहा है।
एक तरफ वनाधिकार पट्टों को लेकर शासन ने दिशा-निर्देश लगातार जारी किए हैं, तो दूसरी तरफ अवैध कटाई और परिवहन के मामले में भी वन विभाग पर आरोप लगते रहे हैं। विकास कार्यों के चलते हरे-भरे पेड़ों की कटाई तो निरंतर हो ही रही है, वहीं वन सीमा और उसके अंदर भी अवैध निर्माण, अतिक्रमण बढ़ रहे हैं। खासकर महू क्षेत्र में इस तरह की कई गतिविधियां सामने आई हैं। चूंकि पर्यटन के हिसाब से भी महू क्षेत्र में सबसे अधिक स्थल हैं और उसके आसपास बड़ी संख्या में फॉर्म हाउस और कॉलोनियों के साथ-साथ कई तरह के निर्माण बढ़ गए हैं, जिसके चलते अब वन मंडला अधिकारी को भी कहा गया है कि जहां मौका-मुआयना किया जाए और विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें और राजस्व अमले के साथ समन्वय स्थापित करते हुए जमीनों के रिकॉर्ड सीमाओं की सही स्थिति को देखते हुए ही अनुमति दी जाए। इसके लिए जीआईएस मैपिंग और सीमांकन करने को भी कहा गया है और सेना तथा कंटोनमेंट प्रशासन से भी इसमें सहयोग मांगा गया है। क्योंकि वन भूमि के आसपास ही फिल्ड फायरिंग रेंज भी मौजूद है। वन विभाग का कहना है कि एनओसी का मकसद किसी तरह के वैध कार्यों को रोकना नहीं है, बल्कि वन क्षेत्र को अवैध निर्माणों से बचाने, जिसमें उत्खनन से लेकर अन्य गतिविधियां शामिल हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि रालामंडल, जो कि वन्य जीव अभ्यारण्य के रूप में चिन्हित है, सुप्रीम कोर्ट आदेश और वन विभाग नियमों के चलते इस पूरे क्षेत्र को भी संरक्षित घोषित किया गया है। मगर यहां भी बिल्डर-कॉलोनाइजरों ने कॉलोनियां काट दी और नगर तथा ग्राम निवेश क्षेत्र के साथ-साथ पंचायत क्षेत्र और फिर निगम से अनुमतियां भी मिल गई। रालामंडल अभ्यारण्य के 100 मीटर के दायरे में अनुमति फिलहाल नहीं दी जा रही है। 247 हेक्टेयर का रालामंडल है और पहले एक किलोमीटर का क्षेत्र ईको सेंसेटिव झोन के रूप में चिन्हित करने का भी हल्ला मचा था। मगर बाद में पता चला कि अगर इसे लागू कर दिया तो सैंकड़ों कॉलोनियां और अन्य हजारों निर्माण इसकी चपेट में आ जाएंगे, जिसके चलते नगर तथा ग्राम निवेश द्वारा फिलहाल 100 मीटर के दायरे के आधार पर ही अनुमतियां दी जा रही है। पूर्व में वन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट आदेश के चलते रालामंडल के आसपास सर्वे कर 52 निर्माणों को चिन्हित नोटिस भी थमाए थे।
