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हाईकोर्ट से मकान खरीददार की याचिका खारिज
जबलपुर। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की एकलपीठ ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि फर्जी या अनरजिस्टर्ड पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर की गई संपत्ति की खरीद वैध नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने 24 साल पुरानी अपील पर सुनवाई करते हुए उक्त मत के साथ मकान खरीददार की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी। उक्त मामला हरदा का है, जहां वर्ष 1997 में कथित रूप से एक अनरजिस्टर्ड पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए मकान की बिक्री की गई थी। अदालत ने इसे कानूनन अवैध ठहराते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
प्रकरण के मुताबिक हरदा निवासी जब्बार खान ने वर्ष 2002 में अपील दाखिल कर दावा किया था कि उसने 20 फरवरी 1997 को महेंद्र कुमार से एक मकान खरीदा था। यह मकान सोना बाई के नाम दर्ज था, जिनका निधन 7 मार्च 1998 को हुआ। सौदा पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए किया गया बताया गया और इसी आधार पर नगर पालिका में नामांतरण भी कराया गया। इसके बाद जब्बार खान ने सोना बाई के दूसरे बेटे राजेंद्र कुमार को संपत्ति से बेदखल करने के लिए सिविल सूट दायर किया। हालांकि, 5 जनवरी 2002 को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत ने सिविल सूट खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ यह अपील उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी।

दो लाख रुपये से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति का विक्रय बिना रजिस्टर्ड पावर ऑफ अटॉर्नी के संभव नहीं

सुनवाई के दौरान अनावेदक राजेंद्र कुमार की ओर से अधिवक्ता अरविंद कुमार पाठक ने दलीलें पेश कीं। एकलपीठ ने सभी तथ्यों पर विचार के बाद कहा कि जिस पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर बिक्री का दावा किया गया, वह न तो अदालत में पेश की गई और न ही उसके रजिस्टर्ड होने का कोई प्रमाण दिया गया। यही नहीं कथित पावर ऑफ अटॉर्नी धारक महेंद्र कुमार को गवाही के लिए भी पेश नहीं किया गया। न्यायालय ने यह ीाी कहा कि दो लाख रुपये से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति का विक्रय बिना रजिस्टर्ड पावर ऑफ अटॉर्नी के संभव नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब्बार खान न तो संपत्ति पर अपना स्वामित्व सिद्ध कर सका और न ही कब्जा खाली कराने का कोई अधिकार दिखा सका। इस आधार पर उचच न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।

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