
इन्दौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई उपरांत उसे निरस्त करते टिप्पणी की कि यह याचिका जनहित में नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक हितों की रक्षा के लिए दायर की गई याचिका है। याचिकाकर्ता परमानंद सिसौदिया ने स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता बताते हुए यह याचिका प्रस्तुत की और इसमें स्नेह नगर में किए जा रहे निर्माण कार्यों में अवैध निर्माण हटाने, बिल्डरों के खिलाफ जांच कराने, उन्हें ब्लैकलिस्ट करने, निर्माण और बिक्री पर रोक लगाने सहित कई राहत मांगी गई थी। सुनवाई दौरान पैरवी करते याचिकाकर्ता की ओर से एड्वोकेट स्वर्णशेखर सिन्हा ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता पूर्व में पार्षद रह चुके हैं और याचिका इसलिए दायर की है कि जो उनके परिजनों के साथ हुआ वो अन्य के साथ न हो। जिस पर शासन की ओर से पेश उपमहाधिवक्ता सुदीप भार्गव ने दलील दी कि याचिका से स्पष्ट है कि यह याचिका, याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्यों बहू और भतीजों के हितों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से दाखिल की गई है, जो प्रस्तावित निर्माण परियोजना से प्रभावित बताए जा रहे हैं उप महाधिवक्ता ने तर्क रखा कि याचिका याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्यों के हितों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से दाखिल की गई है। इसे जनहित याचिका नहीं माना जा सकता। उपमहाधिवक्ता ने कोर्ट को यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता बताया है, लेकिन इसके समर्थन में कोई दस्तावेज नहीं पेश किए। इस पर कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने पूर्व में निर्णय दिया है कि केवल स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता बताना पर्याप्त नहीं है। जनहित याचिका दायर करने के लिए कुछ वर्षों के सामाजिक कार्यों का प्रमाण देना जरूरी है। इस याचिका में याचिकाकर्ता के सामाजिक काम करने के कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया।
