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नई दिल्ली। देश में बढ़ते तेजाब हमलों (एसिड अटैक) की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों के लिए असाधारण दंडात्मक उपायों का जोरदार समर्थन किया है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को केंद्र सरकार को स्पष्ट सुझाव दिया कि तेजाब हमले जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए कानून में संशोधन पर गंभीरता से विचार किया जाए। अदालत का मानना है कि इन मामलों से ठीक उसी तरह सख्ती से निपटा जाना चाहिए जैसे दहेज हत्या के मामलों में निपटा जाता है, जहां अपनी बेगुनाही साबित करने की जिम्मेदारी स्वयं आरोपी की होती है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि जब तक आरोपी के लिए सजा पीड़ादायक नहीं होगी, तब तक समाज में ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाना कठिन है। पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि इस तरह के अपराधों में सुधारात्मक दंड की अवधारणा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसे अपराधियों की संपत्ति क्यों नहीं जब्त की जा सकती? न्यायाधीशों का मानना है कि पीड़ितों को मुआवजा देने और भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकने के लिए आरोपी की संपत्ति कुर्क करने जैसे निवारक उपाय आवश्यक हैं।

तेजाब हमला किसी भी मायने में उससे कम गंभीर अपराध नहीं…..

अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से कहा कि सजा को और अधिक कठोर बनाने के लिए विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। पीठ ने इसकी तुलना दहेज हत्या से करते हुए कहा कि तेजाब हमला किसी भी मायने में उससे कम गंभीर अपराध नहीं है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त निर्देश जारी किए हैं कि वे चार सप्ताह के भीतर तेजाब हमलों से संबंधित विस्तृत जानकारी पेश करें। इसमें पिछले वर्षों के मामलों का ब्यौरा, अदालतों में उनकी वर्तमान स्थिति, अधीनस्थ अदालतों में दाखिल आरोपपत्र और उच्च न्यायालयों में लंबित अपीलों की संख्या शामिल होनी चाहिए।
कोर्ट ने केवल कानूनी आंकड़ों तक ही सीमित न रहकर पीड़ितों के मानवीय पक्ष पर भी जानकारी मांगी है। राज्यों से कहा गया है कि वे प्रत्येक पीड़ित की संक्षिप्त जानकारी, उनकी शैक्षणिक योग्यता, नौकरी की स्थिति, वैवाहिक स्थिति और अब तक हुए चिकित्सा खर्च का विवरण दें। विशेष रूप से उन मामलों का विवरण मांगा गया है जहां पीड़ितों को तेजाब पीने के लिए मजबूर किया गया, जिससे उनके आंतरिक अंगों को जानलेवा नुकसान पहुंचा। यह सुनवाई तेजाब हमले की शिकार शाहीन मलिक द्वारा दायर याचिका पर हो रही थी। मलिक ने अदालत को बताया कि 26 साल की उम्र में हुए हमले के बाद उन्होंने अपने जीवन के 16 महत्वपूर्ण वर्ष कानूनी लड़ाई में बिता दिए, लेकिन अंत में हमलावरों को बरी कर दिया गया। उनकी पीड़ा को समझते हुए कोर्ट ने उन्हें कानूनी सहायता और श्रेष्ठ वकीलों की सेवाएं देने की पेशकश की। याचिका में यह भी मांग की गई है कि दिव्यांग व्यक्तियों की परिभाषा का विस्तार किया जाए ताकि आंतरिक अंगों के नुकसान को झेलने वाले पीड़ितों को भी पर्याप्त मुआवजा और सहायता मिल सके। अदालत ने साफ किया कि वह इस मुद्दे पर व्यापक नीतिगत बदलाव चाहती है ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय और पुनर्वास मिल सके।

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