Spread the love

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में आरक्षण का लाभ लेने के लिए कथित रूप से किए जा रहे धर्मांतरण के मामलों पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को “नए किस्म का फर्जीवाड़ा” करार देते हुए कहा कि प्रभावशाली और सवर्ण जातियों के लोग केवल अल्पसंख्यक आरक्षण हासिल करने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन कर रहे हैं, जो स्वीकार्य नहीं है।
यह टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने हरियाणा के हिसार निवासी निखिल कुमार पुनिया से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता ने स्वयं को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हुए अल्पसंख्यक कोटे के तहत शैक्षणिक संस्थान में दाखिले की मांग की थी। सुनवाई के दौरान जब सीजेआई ने याचिकाकर्ता की सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में सवाल किया, तो उसके वकील ने बताया कि वह जाट पुनिया समुदाय से आता है। इस पर सीजेआई ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, आप पुनिया हैं? फिर आप अल्पसंख्यक कैसे हो गए? मैं यह स्पष्ट रूप से जानना चाहता हूं कि आप किस पुनिया समुदाय से हैं? वकील की ओर से यह दलील दी गई कि धर्मांतरण करना याचिकाकर्ता का मौलिक अधिकार है और अब वह बौद्ध धर्म का पालन करता है। इस पर पीठ ने कहा कि केवल आरक्षण का लाभ लेने के लिए किया गया धर्मांतरण धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को यहीं समाप्त नहीं किया, बल्कि हरियाणा में अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। पीठ ने पूछा है कि अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के लिए राज्य में क्या नियम और दिशा-निर्देश हैं। क्या कोई सामान्य वर्ग का व्यक्ति, जो ईडब्ल्यूएस श्रेणी में भी नहीं आता, केवल धर्म बदलकर अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त कर सकता है? यदि किसी छात्र ने पूर्व में स्वयं को सामान्य श्रेणी का बताया हो, तो क्या वह बाद में लाभ के लिए खुद को बौद्ध अल्पसंख्यक घोषित कर सकता है?
कोर्ट ने कहा कि हरियाणा जैसे राज्यों में जाट समुदाय एक प्रभावशाली वर्ग माना जाता है। यदि इस तरह के मामलों को मान्यता दी गई, तो इससे वास्तविक अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन होगा, जिन्हें संरक्षण देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। सुप्रीम कोर्ट अब हरियाणा सरकार की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। माना जा रहा है कि यह मामला भविष्य में धार्मिक स्वतंत्रता और आरक्षण के बीच की संवैधानिक सीमा तय करने में एक अहम नजीर बन सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *