
भरण-पोषण देने से कतरा रहे पति को हाईकोर्ट से झटका
जबलपुर। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अवनीन्द्र कुमार सिंह की एकलपीठ ने रीवा निवासी एक पति की भरण पोषण को लेकर दायर उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने तर्क दिया था कि उसकी पत्नी एमए पास है और खुद कमा सकती है। अपने आदेश में न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का उच्च शिक्षित होना पति को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। उक्त मत के साथ एकलपीठ ने मामले में फैमिली कोर्ट के भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा।
मामले की सुनवाई के दौरान जब पति कमल की ओर से दलील दी गई कि उसकी पत्नी पूनम ने राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री हासिल की है और वह नौकरी कर सकती है । इस पर न्यायालय ने पूछा, कि क्या आप चाहते हैं कि एक पढ़ी-लिखी महिला गुजारा भत्ते के इंतजार में सड़क पर भीख मांगे?Ó न्यायालय ने कहा कि महज डिग्री होना भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। एकलपीठ ने कहा कि आज के समय में केवल डिग्री होने मात्र से नौकरी मिलना आसान नहीं है। अगर पत्नी अपने स्वाभिमान के लिए छोटा-मोटा काम कर भी रही है, तब भी पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। इस मत के साथ न्यायालय ने पैमली कोर्ट रीवा के आदेश को बरकरार रखते हुए कमल की याचिका खारिज कर दी।
प्रकरण के मुताबिक यह विवाद जून 2021 में हुई शादी के बाद शुरू हुआ था, जिसमें पत्नी ने ससुराल वालों पर एफआईआर दर्ज कराई थी और अलग रहने लगी थी। इस मामले में रीवा की फैमिली कोर्ट ने 27 मई 2024 को पति को आदेश दिया था कि वह अपनी पत्नी को हर महीने 6 हजार रुपये गुजारा भत्ता दे। उच्च न्यायालय ने इस आदेश को पूरी तरह न्यायसंगत बताते हुए पति को हर माह तय राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
