
जून 1990 में आरोपी पूर्व आबकारी अधिकारी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा था
नई दिल्ली। महज 500 रुपए रिश्वत का मामला करीब 36 साल बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया है। यह मामला ट्रायल कोर्ट में 16 साल, हाईकोर्ट में 6 साल और सुप्रीम कोर्ट में 14 साल चलने के बाद आखिरकार अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के एक पूर्व आबकारी अधिकारी की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी सजा घटाकर एक साल की जेल कर दी। आरोपी की उम्र और मामले की लंबी सुनवाई को देखते हुए अदालत ने यह राहत दी है।
बता दें यह मामला जून 1990 का है, जब आरोपी अधिकारी को 500 रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था। इसके बाद उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के तहत मामला दर्ज किया गया था। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2006 में आरोपी को दोषी ठहराया। कोर्ट ने उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दो साल की जेल और 2000 रुपए जुर्माना की सजा सुनाई थी। आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने अप्रैल 2012 में अपना फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया और आरोपी की अपील खारिज कर दी।
इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। यह मामला 2012 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा और पिछले 14 सालों में अलग-अलग पीठों के सामने 21 बार सूचीबद्ध हुआ। आखिरकार जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने सबूतों का सही आकलन करते हुए आरोपी को दोषी ठहराया है और इस फैसले में हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि अपराध के समय आरोपी की उम्र करीब 40 वर्ष थी और अब वह 75 साल का हो चुका है। इसी आधार पर कोर्ट ने उसकी सजा को दो साल से घटाकर एक साल की न्यूनतम सजा कर दिया, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत निर्धारित है।
