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आबकारी टेंडर प्रक्रिया में शामिल नहीं होगी सोम डिस्टलरी
लाइसेंस निरस्त, विभाग की कार्यप्रणाली पर हाई कोर्ट ने उठाए सवाल

भोपाल। सोम डिस्टलरी के अवैध शराब से जुड़े मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसले को सुरक्षित रख लिया है। इसी वजह से आबकारी टेंडर प्रक्रिया में सोम ग्रुप शामिल नहीं हो पाएगा क्योंकि लाइसेंस पहले ही निरस्त किया जा चुका है। इसके साथ ही न्यायालय ने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई में सोम डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में कंपनी को बड़ा झटका लगता दिख रहा है। कंपनी ने लाइसेंस को रद्द करने को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि प्रथम दृष्टया आबकारी विभाग की कार्रवाई कानून के अनुरूप है।
अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि 1200 पेटी विदेशी शराब का परिवहन फर्जी ट्रांजिट परमिट के आधार पर किया गया। याचिकाकर्ता कंपनी अपने जवाब में इस गंभीर आरोप का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सकी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की चुप्पी अप्रत्यक्ष रूप से अपराध स्वीकार करने जैसी स्थिति पैदा करती है।
कर्मचारियों को सजा, कंपनी भी जिम्मेदार
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि कंपनी के कर्मचारियों और संबंधित व्यक्तियों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 और 120-बी सहित,तथा मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम 1915 की धारा 34(2) के तहत दोषी ठहराया जा चुका है।
याचिकाकर्ता की दलील कमजोर
अदालत ने अल्टर ईगो सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनी अपने अधिकारियों/एजेंट्स के कार्यों से अलग नहीं हो सकती है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की दलीलें कमजोर पड़ीं। कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागराथ ने तर्क दिया कि कारण बताओ नोटिस पुराने लाइसेंस अवधि (2023-24) से जुड़ा था। नए लाइसेंस (2024-25, 2025-26) पर इसका असर नहीं होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि आबकारी अधिनियम की धारा 31 के तहत कार्रवाई का आधार अपराध है, न कि सिर्फ लाइसेंस की अवधि। प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का दावा भी खारिज किया। कोर्ट ने पाया कि कारण बताओ नोटिस में आरोप स्पष्ट थे।
शराब व्यापार मौलिक अधिकार नहीं
अदालत ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि शराब का व्यापार कोई मौलिक अधिकार नहीं है। राज्य को इस क्षेत्र में सख्त नियंत्रण का अधिकार है। खासकर जब मामला राजस्व नुकसान और धोखाधड़ी से जुड़ा हो। कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रुख साफ किया। फ्रॉड सभी कार्रवाइयों को शून्य कर देता है। आनुपातिकता के सिद्धांत के तहत भी निलंबन उचित सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले इस मामले में लागू नहीं होंगे।
व्यावसायिक नुकसान झेलना पड़ेगा
कोर्ट ने यह भी माना कि आबकारी आयुक्त द्वारा की गई कार्रवाई कानून के तहत और उचित प्रक्रिया के अनुसार की गई थी। परमिट में गड़बडिय़ों को गंभीर मानते हुए विभाग ने जो कदम उठाया, वह न्यायसंगत है। इस फैसले के बाद सोम डिस्टिलरीज़ को बड़ा आर्थिक और व्यावसायिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। लाइसेंस रद्द होने से कंपनी के संचालन और सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ेगा।
कंपनियों ने पुराने नोटिस को आधारहीन बताया
कंपनियों ने दलील दी कि नोटिस 2023-24 की अवधि से जुड़ा था और 31 मार्च 2024 को लाइसेंस समाप्त हो चुके थे। नए लाइसेंस जारी होने के बाद पुराने नोटिस के आधार पर कार्रवाई को अवैध बताया गया। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह और शासकीय अधिवक्ता मानस मणि वर्मा ने कहा कि एक्साइज एक्ट के तहत कार्रवाई का अधिकार स्पष्ट है और नियमों का पालन अनिवार्य है।
नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस सस्पेंड करना वैध
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शराब का कारोबार पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है। नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस सस्पेंड या रद्द करना कानूनन वैध है। कोर्ट ने कहा कि शो-कॉज नोटिस किसी अवधि तक सीमित नहीं होता। गंभीर आरोप होने पर बाद में भी कार्रवाई संभव है और पुराने उल्लंघन नए लाइसेंस को प्रभावित कर सकते हैं।
धोखाधड़ी साबित होने पर दलीलें कमजोर
फैसले में कहा गया कि धोखाधड़ी किसी भी कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करती है। एक बार आरोप साबित होने पर अन्य दलीलें कमजोर हो जाती हैं। कोर्ट ने कहा कि डिस्टिलिंग, ब्रूइंग और बॉटलिंग जैसी गतिविधियों में गंभीर उल्लंघन होने पर व्यापक कार्रवाई उचित है। यह निर्णय प्रोपोर्शनैलिटी टेस्ट पर खरा उतरता है।

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