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जमीन अधिग्रहण मामले में नेशनल हाईवे अथॉरिटी की याचिका खारिज
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जमीन अधिग्रहण के मामलों में मुआवजा, सोलैटियम (अतिरिक्त राशि) और ब्याज को सरकार पर पडऩे वाले आर्थिक बोझ से नहीं जोड़ा जा सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि सही मुआवजा मिलना संवैधानिक अधिकार है। इसे कमजोर नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिश सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी नेशनल हाईवे अथॉरिटी की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें 4 फरवरी 2025 के फैसले की समीक्षा मांगी गई थी। इस फैसले में कहा गया था कि 2019 का निर्णय में किसानों को मुआवजा और ब्याज देने की बात कही गई थी जो पिछली तारीख से लागू होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन मालिकों को मिलने वाला ब्याज भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार 9 प्रतिशत होगा, न कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी एक्ट के 5 प्रतिशत की सीमा के अनुसार। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने तर्क दिया था कि इससे उस पर करीब 29,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, लेकिन कोर्ट ने इसे समीक्षा का आधार मानने से इनकार कर दिया। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी मामलों को दोबारा नहीं खोला जा सकता। यानी 2018 से पहले के बंद मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा, लेकिन जो दावे पहले से लंबित हैं, उन पर कानून के अनुसार फैसला होगा। कोर्ट ने कहा कि जमीन मालिकों के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया की स्थिरता- दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। 2019 के फैसले में कोर्ट ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी एक्ट की धारा 3जे को असंवैधानिक ठहराया था, क्योंकि यह भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को लागू नहीं होने देती थी और इससे समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन होता था।

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