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सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री कार्यप्रणाली पर सवाल उठा दिए
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली सवाल उठा दिए हैं। मामला जनहित याचिका (पीआईएल) से जुड़ा है, इस याचिका को अगली सुनवाई के लिए एक साल से भी ज्यादा समय से लटका रखा गया है। संबंधित पीआईएल पर आखिरी सुनवाई बीते साल फरवरी में हुई थी और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने मामला आया ही नहीं है। जबकि, सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पीआईएल पर पिछले साल 17 मार्च को ही सुनवाई का आदेश दिया था।
मामला विदेशी क्रेडिट कंपनियों से जुड़ा है, जिन पर आरोप है कि वे बिना भारतीय उपभोक्ताओं की सहमति के ही उनके गोपनीय वित्तीय डेटा जुटते हैं। मामले पर भारत के चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री पर ही गंभीर सवाल उठाकर तीखी टिप्पणी की है।
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम.पंचोली की बेंच ने पीआईएल को अगली सुनवाई के लिए लिस्टिंग में की गई अप्रत्याशित देरी पर कहा, इस अदालत में कुछ बहुत गड़बड़ चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्रार (जुडिशल) से रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश देकर 10 अप्रैल को अगली सुनवाई की तारीख तय की है। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त होकर कहा कि रजिस्ट्रार (जुडिशल) को निर्देश दिया जाता है कि फरवरी 2025 के बाद इस मामले को लिस्ट क्यों नहीं किया गया, इसपर एक रिपोर्ट दायर करें।
सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच, सुप्रीम कोर्ट
इस मामले केंद्र सरकार की ओर से पेश होकर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मामले पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है, क्योंकि 2024 से लंबित पीआईएल पर गृह मंत्रालय ने अपना जवाब दाखिल कर दिया था। इसी मामले में एमिकस क्यूरी के तौर पर सुप्रीम कोर्ट की सहायता करने वाले सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर ने केंद्र सरकार के जवाब के आधार पर नोट दाखिल किया है। बेंच ने उनसे कहा कि वह अपना नोट सॉलिसिटर जनरल के साथ साझा करें और केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है।
दरअसल पीआईएल में चार विदेशी कंपनियों के नाम हैं। इनपर उपभोक्ताओं से बिना जानकारी गोपनीय और संवेदनशील वित्तीय डेटा जुटाकर रखने के आरोप हैं। इसमें पांच भारतीय कंपनियों का भी जिक्र है। अदालत से डेटा गोपनीयता की रक्षा करने और वित्तीय जानकारी को सुरक्षित रखने के निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता सूर्य प्रकाश का कहना है कि क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनीज रेगुलेशन एक्ट, 2005 के तहत यह कार्य प्रतिबंधित है। याचिकाकर्ता की शिकायत है कि विदेशी कंपनियां बिना लोगों की जानकारी के उनसे जुड़े डेटा को भारत से बाहर मौजूद अपने सर्वरों में जमा करके रखते हैं। यह भारत के डेटा लोकेलाइजेशन प्रिंसिपल का उल्लंघन है।

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