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इंदौर। धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रहा कानूनी विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ में सुनवाई के दौरान हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने एक बड़ा दावा पेश किया है। हिंदू पक्ष की ओर से दलील दी गई कि जो इमारत एक बार मंदिर हो जाती है, वह धार्मिक और कानूनी रूप से हमेशा के लिए मंदिर ही रहती है। इस सिद्धांत के आधार पर उन्होंने परिसर में हिंदुओं को नियमित पूजा का अधिकार देने की मांग की है।
अदालत में हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रसिद्ध अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने ऐतिहासिक और कानूनी उदाहरणों के माध्यम से अपना पक्ष रखा। उन्होंने अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले और मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मामले में आए अदालती फैसलों का हवाला दिया। जैन ने तर्क दिया कि किसी भी देवता की ज्यूरिस्टिक पर्सनैलिटी (कानूनी व्यक्तित्व) तब समाप्त नहीं होती, जब उस मंदिर की इमारत या मूर्ति को नष्ट कर दिया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका दावा केवल वर्तमान में की जा रही पूजा पर आधारित नहीं है, बल्कि इस तथ्य पर आधारित है कि वर्तमान ढांचे के निर्माण से बहुत पहले वहां एक भव्य मंदिर मौजूद था। धार स्थित भोजशाला एक 11वीं शताब्दी की ऐतिहासिक इमारत है, जिसे लेकर मान्यता है कि इसका निर्माण परमार वंश के राजा भोज ने करवाया था। हिंदू पक्ष का अटूट विश्वास है कि यह मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर और शिक्षा का बड़ा केंद्र था, जिसे वाग्देवी मंदिर के नाम से जाना जाता था। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है और परिसर में नमाज पढ़ने के अपने अधिकार का दावा करता है। विवाद की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना है। हिंदू पक्ष ने स्पष्ट कहा है कि एक बार मंदिर का स्वरूप सिद्ध होने के बाद वहां का धार्मिक चरित्र नहीं बदल सकता। अब इस संवेदनशील मामले की सुनवाई अगले दिन भी जारी रहेगी, जिस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं। अदालत के रुख से यह तय होगा कि सदियों पुराने इस विवाद का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

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