दमोह। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में ज़िला अदब गोशा, दमोह के द्वारा सिलसिला एवं तलाशे जौहर के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन 14 जून, 2026 इतवार को दोपहर 1:00 बजे से छत्रछाया रिपब्लिक स्कूल, दमोह में ज़िला समन्वयक अदीब दमोही के सहयोग से किया गया।
दमोह में आयोजित सिलसिला एवं तलाशे जौहर के लिए मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने अपने संदेश में कहा कि “मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग के मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी साहित्य और संस्कृति के विविध आयामों पर सार्थक संवाद की परंपरा को आगे बढ़ा रही है। आज जब पर्यावरण संरक्षण विश्वव्यापी चिंता का विषय है, तब साहित्य की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि उसके विवेक और संवेदनशीलता का वाहक भी है। उर्दू शायरी में प्रकृति, पर्यावरण और मानवीय जीवन के पारस्परिक संबंधों को सदैव अभिव्यक्ति मिली है। ऐसे विषयों पर आयोजित साहित्यिक गोष्ठियाँ समाज में जागरूकता उत्पन्न करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपने परिवेश के प्रति उत्तरदायी बनने की प्रेरणा देती हैं। इन्हीं उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए उर्दू अकादमी द्वारा दमोह में आयोजित इस कार्यक्रम में पर्यावरण जैसे समसामयिक विषय को साहित्यिक विमर्श का केंद्र बनाया गया।”
दमोह ज़िले के समन्वयक अदीब दमोही ने बताया कि कार्यक्रम दो सत्रों पर आधारित था। प्रथम सत्र में दोपहर 12:00 बजे से तलाशे जौहर प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें ज़िले के नये रचनाकारों ने तात्कालिक ग़ज़ल लेखन प्रतियोगिता में भाग लिया। निर्णायक के रूप में दमोह के वरिष्ठ शायर डॉ. रफ़ीक़ आलम एवं डॉ. नाज़िर ख़ान मौजूद रहे जिन्होंने प्रतिभागियों को शे’र कहने के लिए दो तरही मिसरे दिये। तलाशे जौहर-2026 के मिसरे
1- मुझको दिल से जुदा नहीं करना।
2- तुम मुझे मिल गए ज़िन्दगी मिल गई।
दिये गये तरही मिसरों पर नए रचनाकारों द्वारा कही गई ग़ज़लों के आधार पर अब्दुल जलील ‘सूफ़ी’ ने प्रथम, प्रेमलता उपाध्याय ‘स्नेह’ ने द्वित्तीय एवं सौरभ जैन ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले तीनों विजेता रचनाकारों को उर्दू अकादमी द्वारा पुरस्कार राशि क्रमशः 3000/-, 2000/- और 1000/- एवं प्रमाण पत्र दिए जाएंगे।
दूसरे सत्र में दोपहर 3:00 बजे सिलसिला के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता समाजसेवी अनवारुल हक़ ने की। वहीं मुख्य अतिथि के रूप में समाजसेवी अरुण टंडन एवं विशिष्ट अतिथियों के रूप में मिर्ज़ा मुबश्शिर बेग, नसीम अहमद मास्टर, विशाल पॉलीवाल, शेख़ हनीफ़, रवि बाथरे, आशीष तंतुवाय मंच पर उपस्थित रहे। इस अवसर पर डॉ. नाज़िर ख़ान ने उर्दू शायरी में पर्यावरण विषय पर वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि “उर्दू शायरी में पर्यावरण के विषय पर गहन अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक कई शायरों ने इस पर क़लम चलाया है। मीर, ग़ालिब, जिगर, फ़ैज़ और कई अन्य प्रसिद्ध शायरों के यहाँ पर्यावरण पर विभिन्न नज़्में और अशआर मौजूद हैं। पहले पर्यावरण केवल प्रकृति के सौंदर्य के रूप में मौजूद था; जहाँ फूल, कलियाँ, गुलशन, वसंत ऋतु आदि प्राकृतिक व्यवस्था के सुंदर नज़ारे देखने को मिलते थे। लेकिन बदलते समय और इंसानों की बढ़ती आबादी के मद्देनज़र उर्दू शायरी में पर्यावरण का परिदृश्य भी बदला है, और यह केवल प्रकृति के सौंदर्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पर्यावरण पर पड़ रहे हानिकारक प्रभावों को भी विषय बनाया गया है, जिसकी आज अत्यंत आवश्यकता भी है।
आधुनिक शायर मजीद अमजद को प्रकृति का शायर माना जाता है। उनकी नज़्म “जंगल” और “नीला पत्थर” पर्यावरणीय परिवर्तन और वनों की कटाई जैसे मुद्दों का बेहतरीन चित्रण करती हैं। साहित्यकार और शायर अपने युग का दर्पण होता है। औद्योगिक क्रांति के बाद मानवीय आवश्यकताओं के मद्देनज़र प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होने के कारण पर्यावरण में तरह-तरह के बदलाव आए। जैसे वनों का निरंतर काटा जाना, ख़तरनाक जानलेवा बीमारियों का बढ़ना, जल और वायु प्रदूषण के दुष्परिणाम जैसे विषयों को उर्दू शायरी में प्रमुखता के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है।”
रचना पाठ में जिन शायरों ने अपना कलाम पेश किया उनके नाम और अशआर निम्न हैं :
अभी वक़्त है फिर न मौक़ा मिलेगा,
मना लो ‘रफ़ीक़’ अपने रब को मना लो।
~डॉ. अब्दुल रफ़ीक़ आलम
तुमने साहिल से ही आवाज़ लगा दी होती,
डूबने वाले को तिनके का सहारा होता।
~फ़रहत दमोही
सुहानी चाँदनी रातें कभी हम जागते भी थे,
सुनाती थी कहानी रोज़ नानी याद आती है।
~नन्हे सिंग ठाकुर ‘आदम’
हम अभी झूठ के पाबन्द नहीं हो पाए,
दूरियां रखना ज़रा पूछने वालो हम से।
~ताहिर दमोही
तमाम रंजो अलम दर्दो ग़म भुलाते हुए,
घरों को जाया करो अपने मुस्कुराते हुए।
~डॉ. नाज़िर ख़ान
उर्दू ज़बान तेरे तसद्दुक़ तेरे निसार,
कितनों को ऐहतराम के क़ाबिल बना दिया।
~तहसीन हैदर जाफ़री
जब से आए हैं वो मिरे दिल में,
दिल का हर गोशा जगमगाता है।
~ताबिश नैयर
ज़िंदगी में कभी एहसान न लेना उनका,
करके एहसान जो एहसान जताने आयें।
~डॉ. ताबिश अहसन
जब रहो तन्हा, रखो अच्छी किताबें पास में,
साथ जब चाहो किसी का अच्छी सोहबत ढूंढना।
~सितारा नाज़
ज़ख़्म खाकर भी परिंदा न रुका, उड़ता रहा।
हाथ मलता ही रहा तीर चलाने वाला।।
~अदीब दमोही
ख़्वाब में उड़ती हुई सब तितलियां जल जाएंगी।
बचपना गुज़रा तो सारी मस्तियां जल जाएंगी।।
~मानव बजाज
नक़्शे पा दूर तलक दिखते हैं भीगे-भीगे,
आबला-पा कोई सहरा में चला है शायद।
~मधुलता पाराशर
इतने बढ़ा दिए हैं मुहब्बत ने इख़्तिलाफ़,
इक दूसरे का हाल भी पूछा नहीं गया।
~अता वारिस दमोही
सूरज है चांद है न कोई आसमान है,
दिल में हमारे देख लो हिंदुस्तान है।
~शेख़ इरफ़ान उस्मानी
इक दम किसी निगाह ने बहका दिया मुझे,
मैं पास होने वाला ही था इम्तिहान में।
~अयाज़ सुल्तानी
कार्यक्रम का संचालन हाजी ताहिर दमोही द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अंत में ज़िला समन्वयक अदीब दमोही ने सभी अतिथियों, रचनाकारों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।

