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उम्र और सहमति पर संदेह का लाभ देकर आरोपी को किया बरी

जबलपुर। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राजेंद्र कुमार वाणी की एकलपीठ ने पॉक्सो और दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा सुनाई गई 10 वर्ष की सजा को निरस्त कर दिया। अपने आदेश में न्यायालय ने कहा कि जब पीड़िता की उम्र और घटना की परिस्थितियों को लेकर गंभीर संदेह हो तथा अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित न कर सके, तब ऐसे में कानून के अनुसार संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना अनिवार्य है। इस मत के साथ एकलपीठ ने आरोपी की तत्काल रिहाई के आदेश दिए हैं।
सागर जिले के सनोधा थाना क्षेत्र के ग्राम परसोरिया निवासी पप्पू साहू को विशेष पॉक्सो न्यायालय, सागर ने 26 दिसंबर 2022 को भारतीय दंड संहिता की धारा 366, 368 और 376(2)(एन) सहित पॉक्सो प्रावधानों के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के सश्रम कारावास एवं जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले को आरोपी की ओर से उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से अधिवक्ता प्रशांत दुबे ने पक्ष रखते हुए न्यायालय के समक्ष पीडिता की उम्र पर सवाल उठाए। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की वास्तविक उम्र को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका। ऑसिफिकेशन (अस्थि) परीक्षण में उम्र 16 से 17 वर्ष के बीच बताई गई थी और डॉक्टरों ने स्वयं इसमें छह महीने तक की त्रुटि की संभावना स्वीकार की थी। अदालत ने कहा कि जब दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य स्पष्ट न हों, तब केवल अस्थि परीक्षण को उम्र का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता लगभग आठ दिनों तक आरोपी के साथ जबलपुर और भेड़ाघाट सहित कई सार्वजनिक स्थानों पर रही। एकलपीठ ने यह भी नोट किया कि इस दौरान उसने किसी से मदद नहीं मांगी, न शोर मचाया और न ही भागने का प्रयास किया। मेडिकल परीक्षण में भी शरीर पर किसी प्रकार की बाहरी चोट नहीं मिली। न्यायालय ने इन परिस्थितियों को मामले के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना।
न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और विरोधाभासों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा। इन्हीं तथ्यां को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट) देते हुए दोषमुक्त कर दिया । साथ ही सह भी आदेश दिए कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा कर दिया जाए। मामले में आरोपी की ओर से अधिवक्ता रमन विश्वकर्मा और हरीश बंगइया ने भी पैरवी की।

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