टिटनेस से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाला खास इम्युनोग्लोब्युलिन इंजेक्शन भी महंगा हुआ

नई दिल्ली। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने कैंसर और टिटनेस जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ आवश्यक दवाओं की कीमतों में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि की घोषणा की है। इस फैसले से आम आदमी पर, खासकर उन मरीजों पर बड़ा आर्थिक बोझ पड़ेगा जिन्हें लंबे समय तक थैरेपी या कीमोथैरेपी की जरुरत है। इस कीमत बढ़ोतरी के पीछे सोशल मीडिया पर किए जा रहे मांग कम करने जैसे दावे भ्रामक हैं। एनपीपीए और उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, इसके कई वास्तविक कारण हैं। वैश्विक स्तर पर एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) और पैकेजिंग सामग्री की लागत में भारी इजाफा हुआ है। पुरानी तय कीमतों पर दवाओं का उत्पादन कंपनियों के लिए घाटे का सौदा बन गया था, जिसके चलते कई कंपनियों ने उत्पादन रोक दिया था। इसके बाद बाजार में इन जीवनरक्षक दवाओं की गंभीर किल्लत का खतरा पैदा हो गया था, जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाना पड़ा।
यह बढ़ोतरी सभी दवाओं पर लागू नहीं हुई है, बल्कि कुछ खास और बेहद जरूरी दवाओं को प्रभावित करेगी। इसमें कैंसर के शुरुआती इलाज में प्रयोग होने वाली चुनिंदा दवाएं जैसे कार्बोप्लैटिन और सिस्प्लैटिन शामिल हैं। साथ ही, टिटनेस से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाला खास इम्युनोग्लोब्युलिन इंजेक्शन भी महंगा हुआ है। राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम से जुड़ी कुछ चुनिंदा वैक्सीन, जैसे बीसीजी और खसरा/मीजल्स भी दायरे में आई हैं।
कार्बोप्लैटिन इंजेक्शन (10 एमजी/एमएल) की कीमत 60.49 प्रति एमएल से बढ़कर 90.74 प्रति एमएल हो गई है। इसी तरह, एंटी-टिटनेस इम्युनोग्लोब्युलिन (500 आईयू) जो पहले 1,920.79 प्रति वायल में मिलता था, अब 2,881.19 प्रति वायल में मिलेगा। यह वृद्धि रोगियों के बजट पर सीधा असर डालेगी। यह फैसला उन लाखों मरीजों और उनके परिवारों के लिए चिंताजनक है जो पहले से ही इन गंभीर बीमारियों के इलाज का भारी खर्च उठा रहे हैं।
