
मुंबई। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषध प्रशासन (एफडीए) की कार्रवाई को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे मनमाना और नागरिकों को परेशान करने वाला रवैया बताया है। पुणे के एक मिठाई दुकानदार के खिलाफ कथित तौर पर गलत तरीके से कार्रवाई कर दुकान बंद कराने के मामले में अदालत ने एफडीए को संबंधित दुकानदार को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। प्रभारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखाड की पीठ ने गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स का लाइसेंस निलंबित करने संबंधी एफडीए के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि स्वच्छता जांच में 98 प्रतिशत अंक हासिल करने के बावजूद दुकान को एक महीने से अधिक समय तक बंद रखना पूरी तरह गलत और गैरकानूनी था। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एफडीए के कामकाज पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह मनमाना रवैया है और एफडीए की कार्रवाई की प्रक्रिया बेहद अजीब है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब दुकान को स्वच्छता जांच में 98 प्रतिशत अंक मिल चुके हैं, तब भी दुकानदार को वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाकर गुहार लगाने के लिए क्यों कहा जा रहा है। कोर्ट ने इसे आम नागरिक को अनावश्यक रूप से परेशान करने वाला रवैया बताया। एफडीए की ओर से यह दलील दी गई कि दुकानदार का आवेदन वरिष्ठ अधिकारियों के पास लंबित था, इसलिए दुकान बंद रखी गई। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और मिठाई की दुकान तत्काल खोलने का आदेश दिया।
34 दिन बंद रही दुकान
जानकारी के अनुसार, 12 जून को भोजन से विषाक्तता की शिकायत और स्वच्छता संबंधी मुद्दों के आधार पर एफडीए ने दुकान का लाइसेंस निलंबित कर दिया था। दुकानदार ने 15 जून को इस फैसले को चुनौती दी। इसके बाद 9 जुलाई को उसने सभी निर्धारित शर्तों को पूरा करने की रिपोर्ट एफडीए के समक्ष पेश की। इसके चार दिन बाद हुई दोबारा जांच में दुकान ने 36 में से 35 अंक हासिल किए। यानी दुकान में करीब 98 प्रतिशत स्वच्छता मानक पाए गए। इसके बावजूद एफडीए ने लाइसेंस बहाल करने से इनकार कर दिया। इसके बाद दुकानदार को न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अभिजीत देसाई ने अदालत को बताया कि दुकान 34 दिनों तक बंद रहने के कारण छोटे कारोबारी को करीब 8.5 लाख रुपये के प्रत्यक्ष राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों को कार्रवाई करते समय कानून और नागरिकों के अधिकारों का पालन करने की नसीहत दी। अदालत के आदेश के बाद दुकानदार को राहत मिली है, वहीं एफडीए की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
