भारत में सूतक भी नहीं लगेगा…..ग्रहण की अलग-अलग अवस्थाएं पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में अलग समय पर दिखाई देंगी

नई दिल्ली। रक्षाबंधन यानी 28 अगस्त को पूर्णिमा के दिन चंद्रग्रहण पड़ रहा है। हालांकि राहत की बात ये है कि भारत में इसका कोई असर नहीं होगा। इसकी खास बात यह है कि अधिकतम चरण के दौरान चंद्रमा का करीब 92 प्रतिशत हिस्सा पृथ्वी की गहरी छाया यानी गर्भच्छाया में पहुंच जाएगा। हालांकि, भारत के लोगों को इसे सीधे आसमान में देखने का मौका नहीं मिलेगा। भारत में ग्रहण की पूरी अवधि के दौरान चंद्रमा क्षितिज के नीचे रहेगा। इसलिए दिल्ली, जयपुर, भोपाल, बेंगलुरु समेत देश के ज्यादातर हिस्सों में यह खगोलीय घटना दिखाई नहीं देगी। भारत में रहने वाले खगोल प्रेमी दूसरे देशों से होने वाली लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए इस घटना को देख सकेंगे।
भारत में यह ग्रहण दिखाई नहीं देने के कारण पारंपरिक पंचांग मान्यताओं के अनुसार सूतक काल लागू नहीं माना जाएगा। दिल्ली के लिए उपलब्ध गणनाओं में भी सूतक की अवधि नहीं बताई गई है। 28 अगस्त का ग्रहण वर्ष 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण होगा। इससे पहले 3 मार्च को साल का पहला चंद्र ग्रहण हुआ था। भारत में लोग इस बार दूसरे देशों से होने वाली लाइव स्ट्रीमिंग के माध्यम से इस खगोलीय घटना को देख सकेंगे।
पांच घंटे से ज्यादा चलेगा ग्रहण…………
खगोलीय गणनाओं के मुताबिक, 28 अगस्त के चंद्र ग्रहण की कुल अवधि करीब पांच घंटे 35 मिनट होगी। इसका उपच्छाया चरण भारतीय समयानुसार सुबह 6:55 बजे शुरू होगा। इसके बाद सुबह 8:04 बजे आंशिक ग्रहण की शुरुआत होगी। ग्रहण सुबह करीब 9:43 बजे अपने अधिकतम चरण पर पहुंचेगा। इस दौरान पृथ्वी की गहरी छाया चंद्रमा के बड़े हिस्से को ढक लेगी। आंशिक ग्रहण का चरण सुबह 11:21 बजे समाप्त होगा, जबकि उपच्छाया चरण दोपहर करीब 12:30 बजे खत्म हो जाएगा। ग्रहण की अलग-अलग अवस्थाएं पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में अलग समय पर दिखाई देंगी।
कई देशों में दिखेगा अद्भुत नजारा
यह चंद्र ग्रहण उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के बड़े हिस्सों में दिखाई देगा। प्रशांत और अटलांटिक महासागर के कुछ क्षेत्रों से भी इसे देखा जा सकेगा। पेरिस, लंदन, रोम, न्यूयॉर्क और जोहान्सबर्ग जैसे शहरों में लोग इस खगोलीय घटना का नजारा देख सकेंगे।ग्रहण के दौरान चंद्रमा का कुछ हिस्सा पृथ्वी की छाया के कारण गहरे लाल या तांबे जैसी आभा में दिखाई दे सकता है। इस प्रभाव को आमतौर पर ‘ब्लड मून’ कहा जाता है। हालांकि, यह पूर्ण चंद्र ग्रहण नहीं होगा, क्योंकि चंद्रमा का पूरा हिस्सा पृथ्वी की गर्भच्छाया में नहीं जाएगा।
