जांच आयोग की रिपोर्ट में सामने आई अधिकारियों की लापरवाही

इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों की जांच कर रहे आयोग की रिपोर्ट ने सरकारी अफसरों की घोर लापरवाही सामने ला दी है। हाई कोर्ट में पेश हुई रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में नई पानी की लाइन बिछाने से जुड़ी फाइल 92 से 100 दिनों तक लंबित रही। चौंकाने वाली बात यह है कि अधिकारियों को सालों से दूषित पानी की आपूर्ति और उससे जुड़ी शिकायतों की जानकारी थी, फिर भी गंभीर मामले पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
जांच के दायरे में आए तत्कालीन निगमायुक्त प्रतिभा पाल, हर्षिका सिंह सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों में से किसी ने भी अपनी गलती मानी नहीं है। सभी ने आयोग के सामने बयान देकर अपनी जिम्मेदारी दूसरे स्तर के अधिकारियों पर डाल दी। जांच आयोग ने सहायक यंत्री, उपयंत्री और पानी की टंकी के स्टाफ सहित कई अधिकारियों के विस्तार से बयान दर्ज किए हैं। रिपोर्ट में 400 पृष्ठ अफसरों के बयानों को समर्पित हैं, जबकि 200 पृष्ठों में आयोग के निष्कर्ष दर्ज हैं।
दूषित पानी की समस्या 2019-20 से ही सामने आ रही थी, जिसके बाद लाइन बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। कोरोना काल में कार्य प्रभावित होने के बावजूद, 2022 में एमआईसी से मंजूरी मिलने के बाद भी काम केवल 60 प्रतिशत ही पूरा हो सका। क्षेत्रीय पार्षद ने 29 फरवरी 2024 को महापौर को पत्र लिखकर गंदे पानी से हो रही बीमारियों की जानकारी दी थी। 30 जुलाई 2025 को पाइपलाइन बदलने के लिए फिर टेंडर निकाला गया, लेकिन वर्क ऑर्डर जारी होने से पहले ही दूषित पानी की समस्या ने गंभीर त्रासदी का रूप ले लिया। यह रिपोर्ट फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है। इस मामले पर 8 सितंबर 2026 को हाई कोर्ट में अगली सुनवाई होगी। याचिकाकर्ताओं ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग शुरू करने की मांग की है। आयोग की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि अधिकारियों की निष्क्रियता और उदासीनता ने एक बड़ी मानवीय त्रासदी को जन्म दिया।
