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राज्य स्तरीय फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने की जरुरत
नई दिल्ली । देश में फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज के लिए राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में फॉरेंसिक जांच के बुनियादी ढांचे की कमी पर गहरी चिंता जाहिर की है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बताया कि कई बार चार्जशीट, 48 घंटे के भीतर दाखिल हो जाती है, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट आने में करीब दो साल लग जाते हैं, जिसका सीधा असर आपराधिक न्याय व्यवस्था पर पड़ता है।
शीर्ष न्यायालय ने कहा कि पहले जमीनी स्तर पर राज्य स्तरीय फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और उनकी क्षमता को मजबूत करने की जरूरत है, उसके बाद ही नियामक मानकों पर बात हो सकती है। पीठ ने चिंता व्यक्त की कि कई राज्यों में भारी संख्या में मामलों के बावजूद फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और मानव संसाधनों की भारी कमी है। विशेष रूप से मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में, जहां जांच के लिए प्रयोगशालाओं की कमी के कारण रिपोर्ट आने में लंबा समय लगता है। पंजाब जैसे राज्य का उदाहरण देकर पीठ ने कहा कि वहां ड्रग्स से जुड़े मामलों की संख्या काफी अधिक है, इसकारण प्रयोगशालाओं में लंबी कतार देखने को मिलती है और आरोपी इसका लाभ उठा सकते हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां आरोपी को वैधानिक जमानत का लाभ मिलने से रोकने के लिए कई बार फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किए बिना चार्जशीट दाखिल कर देती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह आकलन करना आवश्यक है कि वास्तव में देश में कितनी फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं डीएनए विश्लेषण जैसी महत्वपूर्ण जांच करने में सक्षम हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की कि यह स्थिति बताती है कि कानून की किताब में क्या व्यवस्था है और जमीन पर उसकी वास्तविक स्थिति क्या है। याचिकाकर्ता ने ब्रिटेन की तर्ज पर फॉरेंसिक लैब के लिए स्वतंत्र नियामक संस्था बनाने और सभी प्रयोगशालाओं के लिए एक समान मानक तय करने की मांग की थी। इस पर न्यायालय ने संकेत दिया कि सिर्फ नियामक संस्था बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पहले राज्य स्तर पर पर्याप्त संख्या में प्रयोगशालाएं, प्रशिक्षित कर्मचारी और आधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्थिति को प्राथमिक स्कूलों की व्यवस्था किए बिना ही आईआईटी स्थापित करने की मांग जैसा बताया। सुनवाई के दौरान फॉरेंसिक क्षमता बढ़ाने के एक संभावित रास्ते पर भी चर्चा हुई, जिसमें देश के सरकारी कॉलेजों में रसायन विज्ञान और जैव रसायन जैसे विषयों के पीएचडी स्तर के विशेषज्ञों का उपयोग करने का सुझाव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि भारत में पहले से मौजूद मजबूत विज्ञान शिक्षा व्यवस्था का उपयोग फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए क्यों नहीं हो सकता।
सुनवाई के अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी जनहित याचिका में संशोधन करने को कहा, ताकि फोकस केवल राष्ट्रीय नियामक संस्था बनाने की मांग पर नहीं, बल्कि राज्यों में फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की संख्या, मानव संसाधन, डीएनए जांच क्षमता और रिपोर्ट में होने वाली देरी जैसी जमीनी समस्याओं पर भी होना चाहिए।

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