
सेशन कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखा……………….आय छिपाने की कोशिश पर अदालत ने जताई नाराजगी
ठाणे । सालाना करीब 3 करोड़ रुपये की आय वाले एक वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष को अपनी अलग रह रही पत्नी और पांच वर्षीय जुड़वां बेटियों के लिए हर महीने 4 लाख रुपये अंतरिम भरण-पोषण देना होगा। सेशन कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश के खिलाफ पति की अपील खारिज करते हुए कहा कि बच्चों को माता-पिता के वैवाहिक विवाद का “आर्थिक नुकसान” नहीं उठाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि पति की ओर से अपनी वास्तविक आय और पद को छिपाने का प्रयास किया गया। पति ने अपने हलफनामे में खुद को सामान्य ‘वेल्थ मैनेजर’ बताते हुए करीब 1 लाख रुपये मासिक आय का दावा किया था। हालांकि, उसके द्वारा प्रस्तुत वेतन पर्चियों में उसका पद सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और बहु-लाख रुपये का मासिक वेतन दर्ज था। अदालत ने इन दस्तावेजों को महत्वपूर्ण मानते हुए आय से संबंधित तथ्यों के कथित दमन को गंभीरता से लिया। जानकारी के अनुसार दंपति का विवाह 30 मई 2013 को हुआ था और विवाह के दौरान उनकी जुड़वां बेटियां हुईं। पत्नी के अनुसार, समय के साथ वैवाहिक संबंधों में तनाव बढ़ा और उत्पीड़न एवं क्रूरता के कारण वह वर्ष 2021 से पति से अलग रह रही है। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसके और बेटियों के दैनिक खर्च, शिक्षा, आवास, भोजन, चिकित्सा और अन्य आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं कराई। पत्नी ने वर्ष 2022 में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत मजिस्ट्रेट अदालत में अंतरिम आर्थिक राहत की मांग की थी। उसने पति की आय करोड़ों रुपये सालाना होने का दावा करते हुए कहा था कि बच्चों और उसके खर्चों को देखते हुए पर्याप्त आर्थिक सहायता आवश्यक है। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया था कि पति ने अपनी वास्तविक आय और संपत्तियों की जानकारी छिपाई। पति ने इन आरोपों से इनकार किया और दावा किया कि पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र है तथा करीब 3 से 3.5 लाख रुपये प्रतिमाह कमाती है। उसने अपनी आय भी करीब 3 से 3.5 लाख रुपये प्रतिमाह बताई और कहा कि निचली अदालत द्वारा तय 4 लाख रुपये की राशि अत्यधिक है।
आय के दस्तावेजों पर अदालत की नजर
मजिस्ट्रेट अदालत ने 21 फरवरी 2026 को पति को पत्नी और दोनों बेटियों के लिए 4 लाख रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण तथा 10 हजार रुपये मुकदमे की लागत के रूप में देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को सेशन कोर्ट में चुनौती दी। अपील में पति ने दलील दी कि निचली अदालत ने आयकर रिटर्न में दिखाई गई करीब 3 करोड़ रुपये की सकल वार्षिक आय पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया और टैक्स, भविष्य निधि, ग्रेच्युटी, ऋण की देनदारी तथा अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसे खर्चों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उसने यह भी कहा कि इंसेंटिव और अन्य सुविधाओं को नियमित आय मानना उचित नहीं है। हालांकि, सेशन कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2024-25 के लिए पति के दस्तावेजों में 51.75 लाख रुपये की निश्चित सकल वार्षिक सैलरी दिखाई गई थी, जबकि आयकर दस्तावेजों में कुल वार्षिक आय करीब 3 करोड़ रुपये दर्ज थी। अदालत ने कहा कि इससे संकेत मिलता है कि पति की आय निश्चित वेतन के अलावा अन्य स्रोतों से भी थी।
