
तिरुवनंतपुरम। केरल हाईकोर्ट ने वैवाहिक संपत्ति से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाकर कहा है कि केवल संपत्ति के दस्तावेजों में पति-पत्नी दोनों के नाम दर्ज होने से दोनों का बराबर मालिकाना हक साबित नहीं होता। केरल की अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति खरीदने के लिए धन किसने उपलब्ध कराया और उसके पीछे पक्षकारों की मंशा क्या थी, यह तय करने में महत्वपूर्ण है। मामले में अदालत ने पत्नी के नाम विशेष स्वामित्व को मान्यता देकर पति को मकान खाली करने का निर्देश दिया।
मामला 2.8 एकड़ जमीन और उस पर बने मकान से जुड़ा था, इस मकान को पति और पत्नी के संयुक्त नाम पर खरीदा गया था। पत्नी का कहना था कि संपत्ति खरीदने के लिए पूरी रकम उसके पिता ने दी थी और यह राशि उन्होंने अपनी बेटी के हित में उपहार के तौर पर दी थी। इसके समर्थन में पत्नी के पिता ने बैंक स्टेटमेंट पेश किया, जिसमें बिक्री विलेख के निष्पादन वाले दिन उनके खाते से 25 लाख रुपये निकाले जाने का रिकॉर्ड था।
जबकि पति ने दावा किया कि उसने भी संपत्ति खरीदने में आर्थिक योगदान दिया था। उसके मुताबिक, विदेश में काम करने वाले उसके साले ने इसके लिए पैसे दिए थे। हालांकि, वह इस दावे के समर्थन में न कोई गवाह पेश कर सका और न ही धन के स्रोत या भारत लाए जाने से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध करा पाया।
फैमिली कोर्ट ने माना था कि संपत्ति खरीदने की पूरी रकम पत्नी के पिता ने उपलब्ध कराई थी। हालांकि, उसने पति के कथित हिस्से के बदले पत्नी को 15 लाख रुपये देने का आदेश दिया था। पति ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
जस्टिस सतीश निनान और जस्टिस पी. कृष्ण कुमार की खंडपीठ ने पति की भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 से जुड़ी दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत फैमिली कोर्ट प्रभावी तरीके से विवाद निपटाने के लिए संबंधित सामग्री को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि संपत्ति के हस्तांतरण की वास्तविक मंशा जानने के लिए पक्षकारों के आपसी संबंध, व्यवहार, धन के स्रोत और कब्जे जैसी परिस्थितियों को देखा जा सकता है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए जमीन और मकान पर पत्नी का विशेष स्वामित्व घोषित किया तथा पति को तीन महीने के भीतर घर खाली करने का निर्देश दिया।
