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दमोह। नगर के महाकाली चौराहा पर विराजमान माँ महाकाली का दिव्य एवं सौम्य स्वरूप श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और विश्वास का केंद्र है। प्रतिवर्ष की परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए इस वर्ष भी माँ की विशाल एवं मनोहारी प्रतिमा स्थापित की गई है। माँ के दर्शन के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुँच रहे हैं। भक्तजन परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्यता एवं मंगलमय जीवन की कामना के साथ माँ के चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। 1948 से निरंतर चली आ रही है प्रतिमा स्थापना की परंपरा समिति अध्यक्ष पं. प्रहलाद प्रसाद अवस्थी के अनुसार, महाकाली चौराहा पर माँ की प्रतिमा स्थापना का गौरवशाली इतिहास वर्ष 1948 से प्रारंभ होकर निरंतर आगे बढ़ रहा है। इस वर्ष यह परंपरा अपने 79वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। इस धार्मिक परंपरा की शुरुआत में सराफा व्यापारियों द्वारा माँ की प्रतिमा स्थापित करवाई जाती थी। तत्पश्चात स्वर्गीय श्री राज बहादुर राय, स्वर्गीय श्री कालू राम सोनी एवं अन्य लोगों द्वारा इस परंपरा को आगे बढ़ाया गया। इसके उपरांत स्वर्गीय श्री सुभाष राय, पूर्व अध्यक्ष, एवं अन्य श्रद्धालुओं के सहयोग से यह धार्मिक आयोजन निरंतर आगे बढ़ता रहा। आज यह परंपरा केवल प्रतिमा स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि दमोह नगरवासियों की अटूट आस्था, सामूहिक सहभागिता और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक विरासत का प्रतीक बन चुकी है। वर्षों से प्रज्वलित श्रद्धा की यह ज्योति आज भी उसी भक्ति, उत्साह और विश्वास के साथ जगमगा रही है।

स्वर्ण-रजत आभूषणों से सुसज्जित माँ का दिव्य स्वरूप….

माँ महाकाली का भव्य श्रृंगार आयोजन का प्रमुख आकर्षण है। माँ को सोने एवं चाँदी के आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है, जिससे उनका दिव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के मन को मोह लेता है। आभूषणों की सुरक्षा के लिए नवरात्रि के नौ दिनों तक शासन द्वारा 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षा बल तैनात किया जाता है। वहीं, माँ के सेवक (वॉलंटियर) भी रात्रिकालीन ड्यूटी में उपस्थित रहकर जागरण करते हैं और अपनी सेवा एवं समर्पण से आयोजन की व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

नौ दिनों तक श्री दुर्गापाठ एवं शतचंडी अनुष्ठान ……..

नवरात्रि के नौ दिनों तक माँ के दरबार में भक्ति, मंत्रोच्चार एवं वैदिक परंपराओं की दिव्य छटा देखने को मिलती है। आचार्य पं. चंद्र गोपाल जी पौराणिक के मार्गदर्शन में विद्वान पंडितों द्वारा प्रतिदिन शाम 4 बजे से सामूहिक श्री दुर्गापाठ एवं शतचंडी अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। वैदिक मंत्रों की गूँज, दुर्गा सप्तशती का पाठ और भक्तिमय वातावरण संपूर्ण परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। विधि-विधान के साथ हवन एवं पूजन किया जाता है। हवन के पश्चात वितरित किए जाने वाले गंडे (गढ़ा) के प्रति भी श्रद्धालुओं की विशेष आस्था है। इसे प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से भक्त माँ के दरबार में पहुँचते हैं।

आरती में उमड़ता है श्रद्धालुओं का जनसैलाब …….

माँ के पुजारी पं. श्री राजेश तिवारी द्वारा माँ की सेवा, पूजा-अर्चना एवं आरती संपन्न की जाती है। आरती के समय श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह माँ के दर्शन के लिए उमड़ पड़ता है। घंटियों की मधुर ध्वनि, जयकारों की गूँज और दीपों की दिव्य ज्योति से संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो उठता है। नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर माँ की भव्य महाआरती एवं छप्पन भोग अर्पण का विशेष आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित होकर माँ के दर्शन करते हैं तथा प्रसाद ग्रहण कर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। माँ के जयकारों से गूँजता महाकाली चौराहा भक्ति, शक्ति और श्रद्धा के अद्भुत संगम का साक्षी बनता है।

सामूहिक सहयोग से जीवंत है वर्षों पुरानी परंपरा……..

महाकाली चौराहा पर माँ की प्रतिमा स्थापना से लेकर विसर्जन तक वार्डवासियों एवं समस्त श्रद्धालुओं का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इस आयोजन में विशेष रूप से श्री वीरेंद्र राय, श्री रंजीत राय एवं श्री शिवम राय सहित अनेक श्रद्धालुओं द्वारा सहयोग प्रदान किया जाता है। सभी सहयोगियों की सहभागिता सामाजिक एकता, सेवा-भावना और धार्मिक परंपराओं के प्रति समर्पण का परिचायक है। समिति एवं श्रद्धालुओं के सामूहिक प्रयासों से यह धार्मिक आयोजन प्रतिवर्ष भव्यता के साथ संपन्न होता है। सभी सहयोगियों की सहभागिता सामाजिक एकता, सेवा-भावना और धार्मिक परंपराओं के प्रति समर्पण का परिचायक है।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है महाकाली चौराहा

महाकाली चौराहा पर माँ महाकाली का यह भव्य आयोजन दमोह की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 1948 से निरंतर चली आ रही यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के मन में भक्ति की ज्योति प्रज्वलित कर रही है। माँ के दरबार में आने वाला प्रत्येक भक्त अपनी श्रद्धा अर्पित करता है, मनोकामनाएँ माँ के चरणों में रखता है और सुख-शांति, समृद्धि एवं मंगलमय जीवन की कामना करता है। यह आयोजन केवल प्रतिमा स्थापना तक सीमित नहीं, बल्कि वर्षों की आस्था, पीढ़ियों की परंपरा, सामाजिक एकता और सनातन संस्कृति के प्रति अटूट समर्पण की जीवंत गाथा है।

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