सुप्रीम कोर्ट का चुनावी पारदर्शिता पर अहम फैसला

नई दिल्ली। चुनाव से पहले दाखिल किए जाने वाले शपथ पत्र में गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने वाले नेताओं के खिलाफ अब आपराधिक मामला दर्ज कराया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था, चुनावी हलफनामे से जुड़े ऐसे मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 195(1) के प्रतिबंध के कारण निजी व्यक्ति सीधे शिकायत दर्ज नहीं करा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों और प्रेस नोट की व्याख्या करने में न्यायालयों को बाध्यकारी कानूनी प्रावधानों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। हालांकि, झूठा शपथ पत्र देने के प्रत्येक मामले में स्वतः आपराधिक मामला दर्ज होने का कोई अर्थ नहीं है। कार्रवाई संबंधित कानून, आरोपों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होगी।
मामला कर्नाटक के बीदर विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा है, जहां विधायक डॉ. शैलेंद्र बेलदले के खिलाफ राजकुमार मड़की ने चुनावी हलफनामे में आवासीय पते के संबंध में गलत जानकारी देने का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। कर्नाटक हाईकोर्ट ने शिकायत खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए के तहत ऐसी शिकायत कोई निजी व्यक्ति भी कर सकता है। हालांकि, अदालत ने संबंधित विधायक के खिलाफ उस मामले में कार्यवाही दोबारा शुरू करने का कोई फैसला नहीं दिया है। इस फैसले के बाद अब चुनाव के पूर्व गलत शपथ पत्र देने पर आपराधिक मामला दर्ज कराने का रास्ता साफ हो गया है।
