
नई दिल्ली । ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा है कि देश में बड़े बदलाव हमेशा सड़कों पर हुए संघर्षों से आए हैं। आंदोलन केवल अपनी मांगों को पूरा कराने तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे लोगों को जागरूक करने और सत्ता से सवाल पूछने की ताकत देते हैं। जंतर-मंतर पर हुए आंदोलनों, छात्र राजनीति, लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनाव प्रक्रिया को लेकर एक खास बातचीत में उन्होंने अपनी राय रखी।
नेहा बोरा ने कहा कि विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों का जनता के मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरना अच्छी बात है। उनके मुताबिक, विपक्ष को हमेशा लोगों की समस्याओं के लिए संघर्ष करना चाहिए। कांग्रेस के साथ भविष्य में राजनीतिक तालमेल के सवाल पर उन्होंने साफ किया कि आइसा की अपनी विचारधारा और राजनीतिक पहचान है। हालांकि, लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में विभिन्न संगठनों और दलों का साथ आना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन सहित कई आंदोलनों ने दिखाया है कि जनसंघर्ष बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। किसी आंदोलन के बाद संबंधित पद पर दूसरे व्यक्ति की नियुक्ति हो जाने से उसके प्रभाव को खारिज नहीं किया जा सकता।
बोरा के अनुसार, जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों का असर छात्रों के बीच भी दिखाई दिया है। स्कूलों के विद्यार्थी अपनी प्रयोगशालाओं और डेस्क की खराब स्थिति जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने नालसर, रांची और बिहार में छात्रों के प्रदर्शनों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि छात्र अपने अधिकारों और सुविधाओं को लेकर पहले से अधिक मुखर हो रहे हैं।
वामपंथी कार्यकर्ता के रूप में अपनी भूमिका पर उन्होंने कहा कि सड़कों पर उतरकर संघर्ष करना उनके लिए नई बात नहीं है। उनसे पहले की पीढ़ियों ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक माहौल और न्यायिक टिप्पणियों को भी लोकतंत्र से जुड़ी व्यापक बहस का हिस्सा बताया।
चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए नेहा बोरा ने कहा कि केवल किसी एक चुनाव आयुक्त के हटने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की पूरी प्रक्रिया पर रोक लगाने और इससे प्रभावित बताए जा रहे 13 करोड़ लोगों के मतदान अधिकार बहाल करने की मांग की। उन्होंने 2023 के उस कानून पर भी सवाल उठाए, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव किया गया। उनके अनुसार, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के बुनियादी आधार हैं।
