

पथरिया ! गुरु का दर्जा प्रभु से ऊँचा माना गया है। गुरु के बिना गोविन्द अर्थात् भगवान के दर्शन नहीं ही सकते। क्योंकि अध्यात्म मार्ग पर चलने के लिए पथ प्रदर्शक गुरु ही होता है। गुरु ही हमें जीवन में आने वाली टेढ़ी-मेढ़ी कंटीली राहों में उलझने से बचाता है। गुरु वह पारस है जिसके स्पर्श मात्र से शिष्य का जीवन सोने के समान दमकने लगता है। जीवन निर्माण की सही दिशा बताने वाले गुरु के बिना जीवन अधूरा है।
जीवन को संस्कारी बनाने का उपक्रम है गुरु का सम्पर्क। गुणवान व्यक्ति का सान्निध्य बिना प्रयास के ही जीवन में संस्कारों का निर्माण कर देता है। जो लोग बच्चों में संस्कारों का शिलान्यास करके व्यक्तित्व का निर्माण करना चाहते हैं, गुरु के सम्पर्क में आए बिना कुछ पाना चाहते हैं, जो दुर्बुद्धि गुणी-जनों का सम्पर्क छोड़ कर कल्याण की आकांक्षा रखते हैं तो यह मान कर चलो कि वे निर्दयी होकर धार्मिक बनना चाहते हैं, नीति छोड़कर यशस्वी बनना चाहते हैं, आँखों की ज्योति खोकर संसार की हर वस्तु देखना चाहते हैं और मन को चंचल रख कर ध्यान करना चाहते हैं। केवल चाहने मात्र से कोई वस्तु नहीं मिल सकती। इसी प्रकार सत्सम्पर्क के बिना व्यक्ति अपना कल्याण नहीं कर सकता अर्थात् गुरु के बिना तो जीवन में अंधकर ही अंधकार है। वास्तव में गुरु की महिमा अपरम्पार है।
मुनि श्री ने कहा कि गुरु बनाने से पूर्व गुरु की सही पहचान करना अति आवश्यक है। मिट्टी का घड़ा खरीदने से पहले हम उसे ठोक बजा कर उसकी ध्वनि को पहचानने की कोशिश करते हैं कि कहीं से टूटा हुआ तो नहीं है, कहीं से दरार तो नहीं है। इसी प्रकार गुरु के चयन में भी परख होना आवश्यक है। परम पूज्य विरंजन सागर जी महाराज वर्तमान में पथरिया के श्री दिगंबर जैन पारसनाथ बड़ा मंदिर में विराजमान है। वहां पर उन्होंने बच्चों को प्रवचन देते हुए यह बात कही।
