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हाईकोर्ट में तलाक मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित
भोपाल। हाईकोर्ट के न्यायाधीश एमए धर्माधिकारी तथा संजीव एस कालगांवकर की खंडपीठ में तलाक मामले की सुनवाई हुई।याचिकाकर्ता के वकील पंकज खंडेलवाल ने खंडपीठ को बताया। जैन धर्म को हिंदू से अलग नहीं माना जा सकता है।संविधान के अनुच्छेद 25 में हिंदुओं की जो व्याख्या की गई है। उसमें सिख, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों को शामिल किया गया है।
इस मामले में वरिष्ठ वकील सुनील जैन और रोहित मंगल ने कहा, 2014 में जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। बौद्ध और सिख पहले से ही अल्पसंख्यक हैं।जैन समाज को अल्प संख्यक का दर्जा देने के नोटिफिकेशन में केंद्र सरकार ने केवल आरक्षण का उल्लेख किया है। संविधान में किसी तरीके का कोई परिवर्तन हिंदुओं की व्याख्या में नहीं किया गया है।
हाईकोर्ट के न्यायाधीश कालगांवकर ने वकीलों से सवाल पूछा, सीआरपीसी इस मामले में क्या कहती है। इस पर उपस्थित वकीलों ने जवाब दिया। निचली कोर्ट कानून के बाहर नहीं जा सकती है। इस मामले की सुनवाई पूरी हो गई है। हाई कोर्ट 5 मई को अपना फैसला सुनाएगी।
इंदौर की फैमिली कोर्ट ने जैन धर्म के युगलों द्वारा मांगे गए तलाक के मामले में हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक देने से इनकार कर दिया था। 28 आवेदनों को खारिज कर दिया गया था। फैमिली कोर्ट का कहना था, जैन धर्म का अपना पर्सनल लॉ है। जैन धर्म के लोगों की हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक मामले की सुनवाई नहीं हो सकती है। फैमिली कोर्ट के जज ने अपने फैसले में कहा था। जैन धर्म के अपने रीति-रिवाज हैं। इसका उल्लेख जैन धर्म के ग्रंथो में है। फैमिली कोर्ट के आदेश के विरोध में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

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