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(अनुराग हजारी )

नई दिल्ली । दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के निवास से कथित रूप से मिली बड़े मात्रा अधजले नोटों के बंडल मिलने के मामले में जहां सुप्रीम कोर्ट लगातार सख्त होता जा रहा है तो वहीं पिछले तीन दिनों से मीडिया में छप रही खबरों से पूरी न्यायपालिका में हलचल मची है दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने ऊपर लगे आरोपों से साफ इनकार किया है । शनिवार देर रात सुप्रीम कोर्ट ने जले नोटों की तस्वीरें और पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक की। 25 पन्नों की इस रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई कि जस्टिस वर्मा को कोई न्यायिक कार्य न सौंपा जाए। इसमें जस्टिस वर्मा का बयान भी शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा कि स्टोर रूम में नगदी रखने के आरोप निराधार हैं और यह उन्हें बदनाम करने की साजिश है। जस्टिस वर्मा नकदी मिलने की बात से ही इनकार कर रहे हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार की शाम अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर एक वीडियो जारी की, जिसमें जस्टिस वर्मा के आवास से मिले जले हुए नोटों के बंडल दिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की आंतरिक जांच शुरू करने का दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस मामले की जांच तक जस्टिस यशवंत वर्मा को कोई भी न्यायिक जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपलोड वीडियो पर जस्टिस वर्मा ने कहा कि मैं वीडियो की सामग्री को देखकर हैरान हूं क्योंकि उसमें कुछ ऐसा दिखाया गया है, जो मौके पर मिला ही नहीं। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास पर कथित कैश कांड की जांच तेज हो गई है। इस बीच, उनके घर के बाहर अधजले नोटों के बंडल मिलने की तस्वीरें सामने आई हैं। रविवार सुबह जब नई दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) की सफाई टीम तुगलक रोड पहुंची, तो वहां जले हुए नोटों के अवशेष पाए गए। इस मामले में पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक कर चुकी थी, जिसमें न्यायाधीश वर्मा के घर के अंदर भारी मात्रा में नगदी मिलने के आरोप लगाए गए थे। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) ने इस मामले में तीन सदस्यीय समिति गठित कर जांच शुरू कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के घर के अंदर का वीडियो जारी किया, जिसमें चार से पांच बोरियों में अधजले नोट दिखाई दिए। हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों को साजिश करार दिया है। यह मामला तब प्रकाश में आया जबकि 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के लुटियंस दिल्ली स्थित आवास पर आग लग गई थी। मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड और पुलिस टीम को स्टोर रूम में भारी मात्रा में नगदी नोट के बंडल मिले। इसके बाद जब रविवार को एनडीएमसी की सफाई टीम इलाके में सफाई कर रही थी तो जस्टिस वर्मा के आवास के बाहर भी अधजले नोटों के अवशेष पाए गए।

मुझे फसाने और मेरी छवि धूमिल करने की साजिश प्रतीत हो रहीजस्टिस वर्मा

जस्टिस यशवंत वर्मा ने भी इस मामले पर अपनी सफाई दी है उनका कहना है की घटना के दिन पत्नी और मैं भोपाल में थे मेरी बेटी और वृद्ध मां घर पर थी मैं 15 मार्च की शाम पत्नी के साथ दिल्ली लौट आग लगने के बाद आधी रात को बेटी उनके सचिव ने दमकल विभाग को फोन किया था आग बुझाने के दौरान सभी स्टाफ हो मेरे घर की सदस्यों को सुरक्षा कर्म से घटनास्थल से दूर रहने को कहा गया था आग बुझाने की वहां आग बुझाने के बे वहां गए तो उन्हें वहां कोई नकदी या पैसे नहीं मिले मैं और ना मेरे परिवार के किसी सदस्य ने कभी उस स्टोर रूम में नकदी रखी यह राशि मेरी नहीं है ! अगले दिन अदालत शुरू होने से पहले आपने पहली बार वह वीडियो और तस्वीरें दिखाए जो आपसे पुलिस आयुक्त ने साझा की थी इन वीडियो को देखकर मैं स्तब्ध रह गया क्योंकि इसमें दिखाया गया दृश्य उस स्थल से मेंल नहीं खा रहा था जिसे मैंने स्वयं देखा था इसी कारण मैंने पहली बार यह कहा था कि यह मुझे फसाने और मेरी छवि धूमल करने की साजिश प्रतीत हो रही है ! एक जज के लिए उसकी प्रतिष्ठा और चरित्र से बढ़कर कुछ नहीं होता यह घटना मेरी वर्षों की मेहनत और साख को नुकसान पहुंचाने वाली है जस्टिस वर्मा ने अपनी जो सफाई दी है उसमें दो प्रमुख बिंदु है पहला यह कि जस्टिस वर्मा का कहना कि वह नगदी उनकी नहीं है !

अब सवाल यह होता है कि जस्टिस वर्मा को आखिर कोई क्यों फसाएगा…….

अब सवाल उठता है कि हाई कोर्ट के जस्टिस को कई राज्यों में चीफ सेक्रेटरी के स्तर की सुविधा दी गई है और दिल्ली में तो जस्टिस के बंगले के बाहर सीआईएसएफ से लेकर अन्य सुरक्षा की लेयर होती है फिर कैसे कोई घुसकर जस्टिस के घर में इतनी बड़ी धनराशि रख सकता है ! जस्टिस वर्मा ने अपनी सफाई में जो दूसरा बिंदु दिया है वह यह कि मुझे फसाने और मेरी छवि धूमिल करने की साजिश प्रतीत हो रही है अब सवाल यह होता है कि जस्टिस वर्मा को आखिर कोई क्यों फसाएगा और उसके फ़साने के पीछे इतनी बड़ी कौन सी अदावत हो सकती है और जो यह साजिश रचेगा क्या वह इतना पावरफुल है जो हाईकोर्ट के जस्टिस को भी फसाने की और छवि को खराब करने की क्षमता रखता है ! क्या यह बेहतर नहीं होता कि इस मामले में जिस तरह से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने रूख किया है उसको देखते हुए जस्टिस वर्मा सबसे पहले अपना इस्तीफा देते और कहते कि लो दे दिया है इस्तीफा अब करा लो जांच मेरी जब मैंने कहीं कोई गलती नहीं की है तो हो जाने दो जांच लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो सका है! देश में लोग भले राजनीति और राजनीतिज्ञओ की भूमिका से निराश हो पर आज भी पूरे देश मे न्यायपालिका के प्रति अधिकतम लोगों का बड़ा भरोसा है कोर्ट में लाखों केशो का अंबार हो न्याय प्रक्रिया धीमी हो इसके बावजूद लोगों का भरोसा आज भी न्यायपालिका पर विद्यमान! इस मामले में भी जस्टिस वर्मा को अपने ऊपर उठे हो उठे संदेहों के तुरंत बाद ही इस्तीफा देकर एक नई पहल करनी चाहिए थी!

न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित

दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय मुद्रा के चार से पांच अधजले बंडल पाए गए हैं और पूरे मामले की गहन जांच आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को जांच सौंपी थी। जस्टिस वर्मा ने अपने जवाब में कहा कि इस घटना ने एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में एक दशक से अधिक समय में बनाई गई मेरी प्रतिष्ठा को दागदार कर दिया है, और इसने मुझे अपना बचाव करने का कोई साधन नहीं छोड़ा है। मैं आपसे यह भी अनुरोध करूंगा कि आप इस बात पर विचार करें कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में मुझ पर कभी कोई आरोप नहीं लगाया गया और न ही मेरी ईमानदारी पर कभी शक किया गया। बतौर न्यायाधीश मेरे पिछले कामकाज के संबंध में जांच करा ली जाए। जस्टिस डीके उपाध्याय को भेजे पत्र में जस्टिस वर्मा ने लिखा कि मेरे या मेरे परिवार के किसी सदस्य को स्टोर रूम में मिली नकदी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। न ही मेरे या मेरे परिवार को ये नकदी दिखाई गई। स्टोर रूम में कोई ताला नहीं है और वहां कई अधिकारी आते जाते रहते हैं। इस स्टोर रू में सामने के दरवाजे से और पीछे के दरवाजे से भी आया जा सकता है। यह मेरे आवास से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है और यह मेरे घर का हिस्सा नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय ने 21 और 22 मार्च को सीजेआई को भेजी अपनी रिपोर्ट में जो जानकारियां दी है उसमें कहा गया है कि मेरी जांच के मुताबिक प्रथम दृष्टया जिस कमरे में आग लगी वहां किसी बाहरी का प्रवेश संभव नहीं दिखता केवल वहां रहने वाले व्यक्ति , नौकर और सीपीडब्ल्यूडी के कर्मचारी ही जा सकते हैं इसलिए मेरी राय है कि मामले की गहराई से जांच हो ! भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने शनिवार को न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की। समिति के सदस्यों में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनु शिवरामन शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया वीडियो, दिखा नोटों का बंडल गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा नकदी मिलने की बात से ही इनकार कर रहे हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार की शाम अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर एक वीडियो जारी की, जिसमें जस्टिस वर्मा के आवास से मिले जले हुए नोटों के बंडल दिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की आंतरिक जांच शुरू करने का दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस मामले की जांच तक जस्टिस यशवंत वर्मा को कोई भी न्यायिक जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपलोड वीडियो पर जस्टिस वर्मा ने कहा कि मैं वीडियो की सामग्री को देखकर हैरान हूं क्योंकि उसमें कुछ ऐसा दिखाया गया है, जो मौके पर मिला ही नहीं। जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में अचानक आग लग गई थी। जब दमकल कर्मियों ने आग बुझाई, तो बंगले के अंदर भारी मात्रा में नकदी पाई गई। इसके बाद यह मामला न्यायपालिका के उच्चतम स्तर तक पहुंचा, और सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने आपात बैठक बुलाकर जस्टिस वर्मा के तबादले का निर्णय लिया। सूत्रों की मानें तो सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के कुछ सदस्यों ने इस घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि केवल तबादला करने से न्यायपालिका की छवि प्रभावित हो सकती है। कुछ सदस्यों का सुझाव है कि जस्टिस वर्मा से इस्तीफा लिया जाना चाहिए, अन्यथा उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाए। सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई यानी चीफ जस्टिस संजीव खन्ना के नेतृत्व वाले कॉलेजियम ने तुरंत एक्शन लेकर संबंधित जज को दूसरी हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया । दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय ने कहा कि न्यायपालिका इस मामले को गंभीरता से ले रही है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर करने का प्रस्ताव स्वतंत्र और इन हाउस जांच प्रक्रिया से अलग है। जस्टिस यशवंत वर्मा को 11 अक्टूबर 2021 को दिल्ली हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। इससे पहले, वह इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे। उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं, जिनमें 2018 में यूपी के अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में डॉ. कफील खान को जमानत देना भी शामिल है। वह न्यायपालिका की 11 से अधिक समितियों के सदस्य रहे हैं।

जस्टिस वर्मा के वापस इलाहाबाद ट्रांसफर का विरोध ….

इधर, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जस्टिस वर्मा के वापस इलाहाबाद ट्रांसफर का विरोध कर रहा है। एसोसिएशन का कहना है कि कॉलेजियम के फैसले से गंभीर सवाल उठ रहा है कि क्या हम कूड़ादान हैं। बार एसोसिएशन का कहना है कि यह मुद्दा केवल एक न्यायाधीश के ट्रांसफर तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की साख और जनता के विश्वास से जुड़ा मामला है। ऐसे में बार एसोसिएशन इस फैसले के खिलाफ अंतिम दम तक लड़ाई लड़ने को तैयार है। इस मुद्दे पर निर्णय लिया जाएगा और आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा। यदि आवश्यक हुआ, तो एसोसिएशन बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना सकता है।इधर, कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के कुछ सदस्यों का मानना था कि इस गंभीर घटना को सिर्फ ट्रांसफर से नहीं सुलझा सकते है। उन्होंने सुझाव दिया कि न्यायमूर्ति वर्मा को इस्तीफा देने के लिए कहे और अगर वे मना करते हैं, तब उनके खिलाफ आंतरिक जांच शुरू की जाए। अब देखने वाली बात है कि ट्रांसफर से आगे भी एक्शन होता है या नहीं। संविधान के अनुसार, किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार, अनियमितता या कदाचार के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में एक इन-हाउस प्रक्रिया स्थापित की थी। इस प्रक्रिया के तहत, सीजेआई पहले संबंधित न्यायाधीश से स्पष्टीकरण मांगते हैं। यदि जवाब संतोषजनक नहीं होता, तो एक विशेष समिति गठित की जाती है, जो जांच के आधार पर निर्णय लेती है।दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय ने 21 और 22 मार्च को सीजेआई को भेजी अपनी रिपोर्ट में जो जानकारियां दी है उसमें कहा गया है कि मेरी जांच के मुताबिक प्रथम दृष्टया जिस कमरे में आग लगी वहां किसी बाहरी का प्रवेश संभव नहीं दिखता केवल वहां रहने वाले व्यक्ति , नौकर और सीपीडब्ल्यूडी के कर्मचारी ही जा सकते हैं इसलिए मेरी राय है कि मामले की गहराई से जांच हो !

राज्यसभा में ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी पर चर्चा की मांग……..

राज्यसभा में कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इस मुद्दे को सदन में उठाते हुए ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी पर चर्चा की मांग की। राज्यसभा के चेयरमैन और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस पर जवाब देते हुए कहा कि सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है और वह इस मुद्दे पर एक स्ट्रकचर्ड डिस्कसन करवाएंगे। जयराम रमेश ने कहा कि कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सदन में कहा, आज सुबह हमने एक चौंकाने वाली खबर पढ़ी, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के घर से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने की बात सामने आई है। रमेश ने यह भी याद दिलाया कि पहले 50 सांसदों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया था, लेकिन उस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने चेयरमैन से अनुरोध किया कि न्यायिक जवाबदेही बढ़ाने के लिए सरकार को दिशा-निर्देश दिए जाएं। चेयरमैन ने कहा कि राजनेताओं पर होता तो तुरंत कार्रवाई होती। धनखड़ ने कहा कि यह घटना तुरंत सामने क्यों नहीं आई, इस पर चिंता जताई। उन्होंने आश्वासन दिया कि वह सदन के नेता और विपक्ष के नेता से चर्चा करके इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा का रास्ता निकालेंगे। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील अरुण भारद्वाज ने मुख्य न्यायाधीश की बेंच के समक्ष इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए कठोर कदम उठाने की अपील की। इसी के साथ भारद्वाज ने कहा कि यह केवल मेरा विचार नहीं है, बल्कि कई वकीलों की राय है।

न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार का मुद्दा बहुत गंभीर – कपिल सिब्बल

अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा, …न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार का मुद्दा बहुत गंभीर है। यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे देश के वरिष्ठ परिषदों और वकीलों ने पहली बार व्यक्त किया है। यह वर्षों से चल रहा है। सिब्बल ने कहा कि अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर गौर करना शुरू करे कि नियुक्ति प्रक्रिया कैसे होती है। नियुक्ति प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सावधानीपूर्वक होनी चाहिए…भ्रष्टाचार एक बहुत गंभीर मुद्दा है और पीएम मोदी ने जो कहा है उसके बावजूद भ्रष्टाचार बढ़ा है।

फायर ब्रिगेड प्रमुख नया दावा …

फायर ब्रिगेड प्रमुख कह चुके हैं नगदी नहीं मिलने की बात दिल्ली अग्निशमन सेवा डीएफएस के प्रमुख अतुल गर्ग ने अध्यक्ष की बंगले पर कैस को लेकर नया दावा किया है उन्होंने कहा मैंने यह नहीं कहा था कि जज के बंगले पर आग बुझाने के दौरान कैस नहीं मिला शुक्रवार शाम फायर सर्विस के की ओर से ऐसा बयान आया था कि बंगले पर आग बुझाने के दौरान फायर कर्मियों को कोई कैस नहीं मिला अब गर्ग ने इन खबरों का खंडन किया है गर्ग ने कहा मैं इस बारे में स्पष्टीकरण भेज चुका हूं !उन्होंने बताया कि 14 मार्च की रात 11:35 बजे कंट्रोल रूम को आग लगने की सूचना मिली और 11:43 बजे दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंच गईं। आग पर 15 मिनट में काबू पा लिया गया था और उसके बाद पुलिस को इसकी सूचना दी गई।

लांछन और अपुष्ट आरोप जनता की आस्था को कमजोर कर सकते हैं – अधिवक्ता हरीश साल्वे

दिल्ली हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश से जुड़े कथित घर पर नगदी मामले में भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने न्यायिक नियुक्ति प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस प्रणाली में व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया। अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि न्यायपालिका पर लगाए गए लांछन और अपुष्ट आरोप जनता की आस्था को कमजोर कर सकते हैं, जिससे लोकतंत्र को भी नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि न्यायिक नियुक्ति की वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली निष्क्रिय हो चुकी है और इसमें सुधार की आवश्यकता है। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले पर प्रतिक्रिया दे रहे साल्वे ने कहा कि हाल की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि न्यायिक नियुक्तियों को लेकर पुनर्विचार आवश्यक हो गया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जस्टिस वर्मा के आवास पर अग्निशमन विभाग की एक गाड़ी द्वारा आग बुझाने के दौरान भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी। इस घटना को साल्वे ने चेतावनी करार देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि इस पर चर्चा शुरू की जाए। साल्वे ने कहा, कि हमें इस संस्था को बचाना होगा। न्यायपालिका लोकतंत्र का एक प्रमुख स्तंभ है, और यदि इसे कार्यशील बनाए रखना है, तो इसकी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। उन्होंने संसद सदस्यों से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करने और न्यायिक नियुक्ति प्रणाली के लिए एक ठोस ढांचा तैयार करने का आह्वान किया। सोशल मीडिया के प्रभाव का जिक्र करते हुए साल्वे ने कहा कि आज हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं, जहां खबरें बहुत तेजी से फैलती हैं। उन्होंने कहा, यह 1960, 70 या 80 का दशक नहीं है, जब खबरें आने में हफ्तों लगते थे। अब कोई घटना होते ही वीडियो के जरिए 15 मिनट में पूरी दुनिया तक पहुंच जाती है। उन्होंने न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए अपुष्ट रिपोर्टिंग से बचने पर भी जोर दिया। वहीं पूर्व अटार्नी जनरल जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट से बुलेटिन जारी कर जस्टिस वर्मा मामले का पूरा सच बताने का आग्रह किया है उन्होंने कहा कि यह बताया जाए कि आज की सूचना सबसे पहले किसने दी कितना पैसा मिला और पैसा कहां है यह मामला इतने दिन बाद सामने क्यों आया हाई कोर्ट की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं हुई रोहितकी न पूछा कि क्या जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच नगदी मिलने पर शुरू हुई या किसी और कारण से!

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