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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस ओक ने अपने फेयरवेल स्पीच मेंकहा कि सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से काम हाई कोर्ट करते हैं। हाईकोर्ट कमेटियों के जरिए काम करते हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट सीजेआई केंद्रित कोर्ट है। इसमें बदलाव की जरूरत है। आप नए सीजेआई के साथ यह बदलाव देखेंगे। सीजेआई खन्ना ने हमें पारदर्शिता के रास्ते पर आगे बढ़ाया। जस्टिस गवई के खून में लोकतांत्रिक मूल्य हैं। मामलों में ऑटो लिस्टिंग सिस्टम की जरूरत है। हाईकोर्ट में एक निश्चित रोस्टर होता है। इसमे चीफ जस्टिस को भी विवेकाधिकार नहीं मिलता। जब तक हम मैन्युअल इन्टरफेरेंस को कम कम नहीं कर देते, तब तक हम बेहतर लिस्टिंग नहीं कर सकते। लिस्टिंग तर्कसंगत होनी चाहिए।
जस्टिस ओक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की अनदेखी की है। हमारे ट्रायल और जिला न्यायालयों में बहुत ज़्यादा मामले लंबित हैं। ट्रायल और जिला न्यायालयों में लंबित मामलों को निपटाने के लिए एक समिति बनाई गई है। जस्टिस विक्रम नाथ और दीपांकर दत्ता इस समिति के सदस्य हैं। ट्रायल कोर्ट को कभी भी अधीनस्थ न्यायालय न कहें। यह संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है। 25 सालों से अपीलें लंबित हैं। इलाहाबाद जैसी अदालतें आधी संख्या में काम कर रही हैं। 20 साल बाद किसी को सजा देना मुश्किल भरा काम है। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जहां हमें काम करना है। हमें ट्रायल कोर्ट और आम आदमी के बारे में भी सोचना चाहिए।

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