कवि दिवस पर काव्य गोष्ठी

छिंदवाड़ा – साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग का उपक्रम पाठक मंच द्वारा “मित्रता एवं “कवि दिवस” “राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी की जयंती” के उपलक्ष्य में रचनापाठ व्याख्यान का आयोजन, दो चरणों में श्री कमलेश साहू जी की अध्यक्षता में छिंदवाड़ा स्थित भारत माता दिव्यांग छात्रावास, नई आबादी, गाँधी गंज में किया गया है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि आल राउंडर कवि श्री रत्नाकर रतन थे ! कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमति अनुराधा तिवारी द्वारा प्रस्तुत मां सरस्वती की वन्दना से करते हुए प्रथम चरण में “राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी की जीवनी पर लिखित –
कुंठित चेतनाओं पर , है जिसने प्रहार किया,
मानवता देहरी पर है जिसने यह विचार किया।
पंचवटी, साकेत, भारत भारती, विश्व वेदना से,
जिनकी कविता ने नई सुबह का उद्गार किया।

अपनी इन पंक्तियों से प्रकाश डालते हुए, व्याख्यान का संचालन श्री हरिओम माहोरे ने किया और उपस्थित पाठको ने भी अपने अपने विचार व्यक्त किए!
कार्यक्रम के दूसरे चरण में कवि श्री सतीश विश्वकर्मा जी के शानदार संचालन में जिले भर से आमंत्रित कवियों ने काव्यपाठ किया, जिले के ऑलराउंडर कवि रत्नाकर रतन जी ने पढ़ा –
जब गीत मेरा नूतन संदेश लाएगा,
अरे ओ राष्ट्र के सजग प्रहरी सदा तू मुस्कुराएगा ।
आख़िरी साँस तक जीना है मुझे इस लाडले वतन पर,
जब देखूंगा लहराता तिरंगा कराची के मस्तक पर।
जिले की स्थाई कवयित्री अनुराधा तिवारी जी ने पढ़ा –
देखती है जो चारों ओर वही तो बोल जाती है।
छुपे परतों के अंदर राज सारे खोल जाती है।
कलम अपनी पर आती है उजागर सत्य को करती,
निडर हो सत्य को लिखती तो सत्ता डोल जाती है।।
कवि श्री सतीश विश्वकर्मा “आनंद” जी ने पढ़ा –
मैं तुझको कैसे समझाऊं कि कितना प्यार करता हूँ,
तेरे ख़्वाबों में जीता हूँ तेरी यादों में मरता हूँ
तुझे क्या हद बताऊं मैं सनम अपनी मोहब्बत की
तुझे पाने की ख्वाहिश है तुझे खोने से डरता हूँ
कवि हरिओम माहोरे “अर्पण”, ने पढ़ा –
नेह की वेदना रुधिर हो जायेगी,
काव्य की साधना सुधिर हो जायेगी।
सब से जब प्रेम करने लगेंगे सभी,
तब सभी यातना मधुर हो जायेगी।
अमरवाड़ा से आये कवि मनीष जैन “तारण” ने पढ़ा –
तू है कान्हा मेरा मैं सुदामा तेरा
हर विपत्ति में तुम साथ देना मेरा
कवि शशांक पारसे ” पुष्प” ने पढ़ा –
दिल में अब किसी का कौन स्थान रखता हैं।
वो बस अब अपने दिल में अरमान रखता हैं।
अपनी नज़रे भी उसी पर मेहरबान रखता हैं।
जो उसकी जरूरतों का सामान रखता हैं।।
शशांक दुबे जी ने पढ़ा –
दोस्ती ही तो ऐसी महज़ होती है
जिसमें कोई न ग़रज़ होती है
जैसे होते है वैसे ही दिखते है
ये यारियाँ बड़ी सहज होती है
कवयित्री पदमा जैन “पदम” ने पढ़ा –
पहुंच से दूर हो मंजिल तो ग़ज़ल होती है।
कभी उलझन ,कभी मुश्किलों का हल तो गज़ल होती है। कभी महफिलों में ज़िक्र हमारा, कभी ज़िक्र की महफ़िल तो ग़ज़ल होती है।
चौरई से आये कवि रहेश वर्मा ने पढ़ा –
संग अपने अनेकों सौगात, बच्चो झूमो फिर आ गई बरसात।
सौंधी सी खुशबू उड़ी पवन में, रौनक है काफी देखों चमन में, कीट पतंगें लेकर एक लाख, पानी फुहार संग आया आषाढ़, हँसते हुए पेड़ और मुस्काते पात, बच्चों झूमो फिर आ गई बरसात ।
सलैया से आये कवि श्रीकांत सराठे जी ने पढ़ा –
राष्ट्र की सुंदरता विभिन्नताओं के साथ, अभिन्न है हम,
बहुभाषी मराठी, हिन्दी है हम |
सुशोभित भारत के गले में,रत्नजड़ित भाषाओं की माला,
इन्होने आपस मे कोई द्वेष न पाला |
हिन्दी, मराठी भारत की, सभी भाषा -बोलियाँ,
किसी से कोई बैर नहीं,आपस में सब संग -सहेलियाँ |
परदेस जाकर भी बालक, माँ को माँ ही कहेगा, बाद, शिष्टाचार मे मौसियाँ।
शिव शंकर नाग “जिज्ञासु” जी ने पढ़ा ” एक पेड़ मां के नाम ” पर काव्य रचना –
रग-रग में जो, भरती जान ।
जिसमें बसते, सबके प्रान ।।
वायु का, आधार है जिसमें ।
एक पेड़ लगाओ, मां के नाम ।।
सभी ने एक से बढ़कर एक अपनी मनमोहक कविताओं, गजलों, गीतों और शेरो- शायरी से समां बांधा श्री स्वप्निल राजपूत जी भी जिसके साक्षी रहें !
कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम के अध्यक्ष कवि सश्री रत्नाकर रतन जी अपनी कविताओं के माध्यम से कार्यक्रम को ऊंचाइयों प्रदान की ! श्री हरिओम माहोरे ने कार्यक्रम की सफलता पर उपस्थित जनों का विशेष आभार व्यक्त कर कार्यक्रम का समापन की घोषणा की।
