सिर्फ कब्जे के आधार पर निजी मालिकाना हक का दावा नहीं किया जा सकता – न्यायालय

दमोह ! न्यायाधीश स्नेहा सिंह की कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक सरकारी जमीन पर निजी स्वामित्व के दावे को खारिज कर दिया है। यह मामला ग्राम भाट खमरिया, तहसील जबेरा से जुड़ा है, जहाँ मदन रायकवार ने खसरा नंबर 210 और 211 की कुल 0.880 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर अपना स्वामित्व होने का दावा किया था। मामले में राज्य सरकार द्वारा कलेक्टर की ओर से राजीव बद्री सिंह ठाकुर ने कोर्ट में उपस्थित होकर पक्ष रखा।
मामला इस प्रकार था, वादी मदन रैकवार ने कोर्ट में एक दावा पेश किया था कि तहसील जबेरा की भाट खमरिया की सरकारी जमीन उसके पिता और दादा के समय से वर्ष 1940 से उनके कब्जे में है, और इसलिए इसका मालिकाना हक उनके परिवार को मिलना चाहिए। वादी का कहना था कि यह जमीन उसके पूर्वजों ने खरीदी थी और वे 1940 से इस पर खेती कर रहे हैं। इस दावे के समर्थन में वादी ने एक पुराना रजिस्ट्रीकरण दस्तावेज और दो साक्षी भी कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किये। वहीं सरकारी वकील ने तहसीलदार जबेरा का जवाबदावा प्रस्तुत कर न्यायालय में बताया कि विवादित भूमि के तालाब के पानी का उपयोग गांव के लोग और जानवर करते है और जो खाली जमीन है उसमें शासन क्षेत्र के लोगों के हित में कार्य करना चाहती है, वादी ने जमीन के वर्तमान में बेशकीमती होने से हड़पने के उद्देश्य से केस लगाया है
कोर्ट का फैसला…….
कोर्ट ने इस पूरे मामले की गहनता से जाँच की और दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने पाया कि खसरा नंबर 210 और 211 की जमीन सरकारी अभिलेखों में मध्यप्रदेश शासन के नाम पर दर्ज है और यह जमीन सार्वजनिक उपयोग में है। निर्णय में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी सरकारी जमीन पर सिर्फ कब्जे के आधार पर निजी मालिकाना हक का दावा नहीं किया जा सकता, वैसे भी वादी अपने दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस कानूनी सबूत पेश नहीं कर सका, साथ ही सरकारी जमीन पर निजी दावे को तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका स्पष्ट और वैध कानूनी आधार न हो।
