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हिंसा का रास्ता छोडकऱ मुख्यधारा में लौटी है एसीएम सुनीता
बालाघाट। मर्जी से कोई नक्सली नहीं बनता और न ही कोई हथियार उठाता है। बल्कि जबरदस्ती घरों से उठाकर व दबाव देकर नक्सली बना दिया जाता है। विरोध करने पर अत्याचार किया जाता है, हर समय मौत का साया मंडराते रहता है। यही स्थिति सुनीता के साथ भी बनी थी। यह दास्तां हाल ही में आत्मसमर्पण करने वाली तीन राज्यों की इनामी महिला नक्सली एसीएम सुनीता ओयाम के परिजनों ने बताई। सुनीता के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य 3 नवंबर को बालाघाट पहुंचे थे। 4 नवंबर को उन्होंने अनुवादक के माध्यम से मीडिया से चर्चा की।
बेटी सुनीता को आत्मसमर्पण करने और उसके सकुशल होने की सूचना बालाघाट पुलिस से मिलने के बाद पिता दसरु ओयाम, मां बुधरी ओयाम, चाची ग्राम पंचायत के सरपंच के साथ बालाघाट पहुंचे थे। हिंसा का रास्ता छोडकऱ मुख्यधारा में लौटी एसीएम सुनीता से उसके परिजन तीन वर्ष बाद मिले हैं। सुनीता ने 1 नवंबर को लांजी के चौरिया कैंप में सशस्त्र आत्मसमर्पण किया था। वर्ष 2022 से दलम में शामिल होने के बाद पहली बार 4 नवंबर को सुनीता अपने माता-पिता से मिली थी। बेटी को सकुशल देखकर माता-पिता भावुक हो उठे। इस दौरान माता-पिता के साथ-साथ सुनीता के भी आंखों से आंसू झलक उठे थे। परिजनों से मिलाने में बालाघाट पुलिस का अहम योगदान रहा है। उल्लेखनीय है कि सुनीता के माता-पिता को हिंदी नहीं आती है। जिसके चलते गांव के सरपंच पोरियाम ने बालाघाट में अनुवादक की भूमिका निभाई थी।
दूसरी बेटी की मांग करने पर जताया था विरोध
परिजनों ने बताया कि उनकी पंाच संताने हैं। जिनमें से नक्सलियों ने सुनीता को घर से जबरदस्ती उठाकर लेकर गए थे। इसके बाद दूसरी बेटी को भी दलम में शामिल करने की मांग कर रहे थे। लेकिन उन्होंने इसका विरोध जताया। विरोध के बदले में नक्सलियों की अन्य मांगों को पूरा करना पड़ता था। उन्होंने बताया कि गांव के तीन-चार युवा अभी भी दलम में है। जबकि तीन लोगों की घर वापसी हो चुकी है।
दलम में होता है शोषण, अत्याचार
परिजनों के अनुसार दलम में शोषण किया जाता है, अत्याचार होता है। वहां सुनवाई करने वाला कोई नहीं होता है। बस जंगलों में ही घुम-घुमकर अपना जीवन बीताना पड़ता है। हर समय मौत का खतरा बना रहता है। परिस्थितियां ऐसी रहती है कि दलम में रहकर चाहते हुए भी घर वापसी नहीं कर पाते हैं। बहुत ही कम स्थिति में लोग दलम छोड़ पाते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के बीजापुर जिले का गोमवेटा गांव जंगलों में बसा हुआ है। यहां नक्सलियों का साया हर समय बना रहता है। ग्रामीण एक ओर लाल आतंक के साए में अपना जीवन यापन करते हैं। तो दूसरी ओर पुलिस का भी डर बना रहता है।
बालाघाट पुलिस और मप्र सरकार का जताया आभार
जीआरबी डिवीजन में सक्रिय एसीएम रेंक की 14 लाख रुपए की इनामी महिला नक्सली सुनीता ओयाम ने 1 नवंबर को लांजी क्षेत्र के चौरिया कैंप में सशस्त्र आत्मसमर्पण किया था। सुनीता को आत्मसमर्पण नीति के तहत मिलने वाली सभी सुविधाएं और लाभ प्रदान किए जाएंगे। आत्मसमर्पण करने के बाद सुनीता को मिल रही सुविधाओं के लिए परिजनों ने बालाघाट पुलिस और मध्यप्रदेश सरकार का आभार भी जताया है। उन्होंने सभी नक्सलियों से अपील की है कि वे भी आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में लौटें।
नक्सली सशस्त्र करें आत्मसमर्पण, सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी-एसपी
एसी आदित्य मिश्रा ने कहा कि हार्डकोर सशस्त्र महिला नक्सली सुनीता ओयाम ने संविधान और लोकतंत्र में अपनी अस्था व्यक्त करते हुए बालाघाट पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया है। सुनीता ने पूछताछ में बताया कि जंगलों में पुलिस का दबाव बढ़ गया है। एक स्थान पर ज्यादा देर तक रुक नहीं पा रहे थे। नक्सली जीवन में बने डर, शोषण और असुरक्षा से तंग आकर व शासन की आत्मसमर्पण नीति से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया। दलम में हो रहे अत्याचार व शोषण से वह मानसिक रुप से काफी प्रभावित हो चुकी थी। एसपी ने सभी नक्सलियों से अपील की है कि वे सशस्त्र आत्मसमर्पण करें, उनके सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी है। सशस्त्र आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को शासन की नीति के तहत मिलने वाले सभी लाभ प्रदान किए जाएंगे।

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