
मारुताल बाइपास की शासकीय भूमि पर कब्जा हटाने का रास्ता साफ
अदालत ने वादीगण का दावा किया निरस्त
शासन की ओर से तहसीलदार रॉबिन जैन ने साक्ष्य प्रस्तुत कर शासन का पक्ष मजबूत किया
दमोह। सिविल न्यायाधीश अनुप्रक्षा जैन की अदालत ने मारुताल बाईपास के पास स्थित पाँच एकड़ से अधिक की बेशकीमती शासकीय भूमि पर कब्जाधारियों द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने शासन को उनके कच्चे-पक्के मकान तोड़ने और भूमि से बेदखल करने से रोकने तथा स्वयं को भूमि स्वामी घोषित करने की मांग की थी। शासन के प्रतिनिधि कलेक्टर की ओर से सरकारी वकील राजीव बद्री सिंह ठाकुर ने कलेक्टर दमोह का पक्ष रखते हुए प्रकरण में बहस की। मामले का विवरण वादी मलखान मुंडा, मोहन मुंडा, दुर्गाबाई मुंडा, शांतिबाई मुंडा और राजा मुंडा ने अदालत में दावा किया कि वे अपने पिता के समय से लेकर आज तक—लगभग 30 वर्ष से भी अधिक समय से—उक्त शासकीय चरनोई मद की भूमि पर कच्चे-पक्के घर बनाकर निवास कर रहे हैं। उनका कहना था कि राजस्व अधिकारी उनके कब्जे से अवगत रहे हैं और कभी बेदखली की कार्रवाई नहीं की गई। वादीगण ने स्वयं को भूमिहीन, गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाला तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग का बताते हुए दावा किया कि लंबे समय के कब्जे के आधार पर वे भूमि स्वामी के हकदार हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राजस्व अधिकारी उन्हें पुलिस बल के माध्यम से बेदखल करने की तैयारी में हैं और कब्जा हटाने के बदले आवास दिलाने का लालच दे रहे हैं। शासन का पक्ष कलेक्टर दमोह की ओर से सरकारी वकील राजीव बद्री सिंह ठाकुर ने न्यायालय को बताया कि विवादित भूमि शासन की है तथा उसे हाउसिंग बोर्ड को कमजोर वर्ग के नागरिकों के लिए आवास उपलब्ध कराने हेतु संरक्षित कर आवंटित किया जा चुका है। वादीगण बिना किसी अधिकार के इस बेशकीमती भूमि पर अवैध कब्जा किए हुए हैं और उन्हें राजस्व अभिलेखों में भूमिस्वामी घोषित करने का कोई कानूनी आधार नहीं है। शासन की ओर से तहसीलदार रॉबिन जैन ने साक्ष्य प्रस्तुत कर शासन का पक्ष मजबूत किया। न्यायालय का निष्कर्ष दोनों पक्षों की गवाही और साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद न्यायालय ने कहा: वादीगण यह साबित नहीं कर पाए कि उनका कब्जा वैधानिक रूप से भूमि स्वामित्व का आधार बन सकता है। मात्र लंबे कब्जे के आधार पर कोई भी व्यक्ति शासकीय भूमि का पट्टा या स्वामित्व प्राप्त नहीं कर सकता। भूमि शासन की है, जिसे शासन किसी भी प्रयोजन हेतु सुरक्षित रख सकता है या आवंटित कर सकता है। वादीगण का कब्जा अवैध है; इसलिए उन्हें बेदखल करने या उनके कच्चे-पक्के घर हटाने की कार्रवाई पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने सभी वादियों का दावा निरस्त करते हुए कहा कि शासन विधि अनुसार भूमि का कब्जा लेने के लिए बाध्य है और वादीगण को बेदखल होने से किसी प्रकार की न्यायिक सुरक्षा नहीं मिल सकती।
