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हाईकोर्ट ने कार्रवाई को सही ठहराया; कहा-ये उद्यमिता की भावना के खिलाफ
भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगल पीठ ने ग्वालियर में एक औद्योगिक भूखंड का आवंटन और लीज निरस्तीकरण को वैध ठहराते हुए इसे उद्यमिता की मूल भावना के अनुरूप बताया है। कोर्ट ने कहा कि वर्षों तक उद्योग स्थापित न करना गंभीर लापरवाही है, जो न केवल औद्योगिक विकास को बाधित करता है, बल्कि सक्रिय और इच्छुक उद्यमियों के अवसर भी छीनता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य शासन द्वारा की गई यह कार्रवाई न तो मनमानी है और न ही नियमों के विरुद्ध। लंबे समय तक भूखंड को निष्क्रिय रखना औद्योगिक नीति और विकास के उद्देश्यों के विपरीत है।
यह मामला ग्वालियर के बाराघाटा औद्योगिक क्षेत्र स्थित करीब 15 हजार वर्गफुट भूमि से जुड़ा है। उक्त भूखंड वर्ष 1981 में सीताराम साहनी को फोटो फ्रेम और संबंधित उद्योग स्थापित करने के लिए 99 वर्षों की लीज पर आवंटित किया गया था। लीज की शर्तों के अनुसार तय समय-सीमा में निर्माण कर उत्पादन शुरू करना अनिवार्य था। रिकॉर्ड के अनुसार भूखंड पर न तो कोई निर्माण हुआ और न ही कोई औद्योगिक गतिविधि प्रारंभ की गई। शर्तों के उल्लंघन पर वर्ष 1990 में लीज निरस्त कर दी गई थी। इसके खिलाफ दायर याचिका पर वर्ष 1995 में हाईकोर्ट ने आवंटी को एक और अवसर देते हुए निरस्तीकरण आदेश रद्द किया, लेकिन इसके बाद भी भूखंड पर कोई गतिविधि शुरू नहीं हुई।
2008 में दूसरे को आवंटन
वर्ष 1996 में मूल आवंटी सीताराम साहनी का निधन हो गया। उनके उत्तराधिकारियों ने भी उद्योग स्थापित करने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया। राज्य शासन ने अदालत को बताया कि करीब 26-27 वर्षों तक भूखंड निष्क्रिय रहा, जिससे औद्योगिक विकास प्रभावित हुआ। निरीक्षण के बाद वर्ष 2008 में शासन ने भूखंड का कब्जा लेकर इसे मेसर्स ग्वालियर स्टोन वक्र्स को पुन: आवंटित कर दिया, जहां वर्तमान में औद्योगिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। अपीलकर्ता चंद्रकुमार साहनी की ओर से दलील दी गई कि लीज विधिवत निरस्त नहीं की गई और नोटिस प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैसे ही आवंटन निरस्त होता है, लीज स्वत: ही प्रभावहीन हो जाती है। अदालत ने अपील खारिज करते हुए राज्य शासन की कार्रवाई को सही ठहराया।
भूखंड का आवंटन और लीज निरस्तीकरण वैध
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगल पीठ ने ग्वालियर में एक औद्योगिक भूखंड का आवंटन और लीज निरस्तीकरण वैध ठहराया है। यह कार्रवाई भूखंड पर 26 साल तक उद्योग स्थापित न करने के कारण की गई। कोर्ट ने इसे उद्यमिता की मूल भावना के विपरीत और गंभीर लापरवाही बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्षों तक उद्योग स्थापित न करना न केवल औद्योगिक विकास को बाधित करता है, बल्कि सक्रिय और इच्छुक उद्यमियों को भी अवसर से वंचित करता है। राज्य शासन की यह कार्रवाई न तो मनमानी है और न ही नियमों के विरुद्ध। यह मामला ग्वालियर के बाराघाटा औद्योगिक क्षेत्र स्थित 15 हजार वर्गफुट भूमि से संबंधित है। यह भूखंड वर्ष 1981 में सीताराम साहनी को फोटो फ्रेम और संबंधित उद्योग स्थापित करने के लिए 99 वर्षों की लीज पर दिया गया था। लीज की शर्तों में तय समय-सीमा के भीतर निर्माण कर उत्पादन शुरू करना अनिवार्य था। हालांकि, भूखंड पर न तो कोई निर्माण हुआ और न ही कोई औद्योगिक गतिविधि शुरू की गई। शर्तों के उल्लंघन पर वर्ष 1990 में लीज निरस्त कर दी गई थी। इसके खिलाफ दायर याचिका पर वर्ष 1995 में हाईकोर्ट ने आवंटी को एक और अवसर देते हुए निरस्तीकरण आदेश रद्द कर दिया था। लेकिन, इस अवसर के बाद भी भूखंड निष्क्रिय ही बना रहा। वर्ष 1996 में मूल आवंटी का निधन हो गया, और उनके उत्तराधिकारियों ने भी उद्योग शुरू करने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया। राज्य शासन ने अदालत को बताया कि लगभग 26-27 वर्षों तक भूखंड निष्क्रिय रहा, जिससे औद्योगिक विकास प्रभावित हुआ। वर्ष 2008 में निरीक्षण के बाद भूखंड का कब्जा लेकर इसे मेसर्स ग्वालियर स्टोन वक्र्स को पुन: आवंटित कर दिया गया, जहां वर्तमान में औद्योगिक गतिविधियां संचालित हैं। अपीलकर्ता चंद्रकुमार साहनी ने दलील दी थी कि लीज विधिवत निरस्त नहीं की गई और नोटिस प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आवंटन निरस्त होते ही लीज स्वत: प्रभावहीन हो जाती है।

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