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अहमदाबाद। गुजरात के सूरत नगर की फैमिली कोर्ट ने एक अहम फैसले में सात वर्षीय जैन बच्ची की दीक्षा पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश बच्ची के पिता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट के जज एस.वी. मंसूरी ने दिया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 2 जनवरी तय की है। साथ ही बच्ची की मां को निर्देश दिया गया है कि वह हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि प्रस्तावित दीक्षा समारोह में बच्ची को शामिल नहीं किया जाएगा।
मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्ची की दीक्षा फरवरी 2026 में मुंबई में होने वाले एक सामूहिक दीक्षा समारोह में प्रस्तावित थी। पिता ने अदालत में दलील दी कि उनकी बेटी अभी केवल सात साल की है और इतने कम उम्र में उसके जीवन से जुड़ा इतना बड़ा और स्थायी निर्णय लेना उचित नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, अदालत को बताया गया कि करीब एक साल पहले इस मुद्दे को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद हुआ था। इसके बाद महिला अपने दोनों बच्चों को लेकर मायके चली गई थी। 10 दिसंबर को बच्ची के पिता ने गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर बेटी की कस्टडी की मांग की थी।
पिता का कहना है कि उन्होंने पहले पत्नी से इस विषय पर चर्चा की थी और दोनों इस बात पर सहमत थे कि बच्ची जब परिपक्व उम्र की हो जाएगी, तभी साध्वी बनने जैसे निर्णय पर विचार किया जाएगा। हालांकि, बाद में पत्नी ने फरवरी 2026 में होने वाले दीक्षा समारोह में बच्ची की दीक्षा कराने पर जोर देना शुरू कर दिया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि अप्रैल 2024 में पत्नी दोनों बच्चों को लेकर मायके चली गई और शर्त रखी कि जब तक दीक्षा के लिए सहमति नहीं दी जाएगी, वह ससुराल वापस नहीं आएगी। पिता ने आरोप लगाया कि पत्नी बच्ची को लगातार धार्मिक कार्यक्रमों में ले जाती रही और एक बार बिना उनकी अनुमति अहमदाबाद के एक गुरु के आश्रम में बच्ची को अकेला छोड़ दिया गया। इसी तरह मुंबई के एक जैन मुनि के आश्रम में भी बच्ची को छोड़े जाने और पिता को उससे मिलने न देने का आरोप लगाया गया है।

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