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हाईकोर्ट ने कहा – ड्यूटी पर तैनात सरकारी सेवकों के खिलाफ बिना सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के मुकदमा दर्ज करना कानूनी रूप से गलत
जबलपुर। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बीपी शर्मा की एकल पीठ ने एक मामले में सुनवाई करते हुए पश्चिम मध्य रेल के तीन विजिलेंस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को अवैध करार देते हुए खारिज कर दिया है। एकल पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ड्यूटी पर तैनात सरकारी सेवकों के खिलाफ बिना सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के मुकदमा दर्ज करना कानूनी रूप से गलत है।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत याचिका में उल्लेख किया गया था कि रेलवे के विजिलेंस विभाग में तैनात तीन अधिकारियों क्रमश: एसीएम सुनील कुमार श्रीवास्तव, चीफ ऑफिस सुपरिटेंडेंट नीरज कुकरेजा, और विजिलेंस इंस्पेक्टर हेमंत राकेश के खिलाफ कटनी जीआरपी (गवर्नमेंट रेलवे पुलिस) में एक मामला दर्ज किया गया था। यह मामला टिकट निरीक्षक प्यार सिंह मीणा द्वारा दी गई शिकायत पर आधारित था, जिसमें उन्होंने उक्त अधिकारियों पर जातिगत अपमान और मारपीट के आरोप लगाए थे।
मामले में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सभी पक्षें को सुनने व विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के बाद जारी अपने फैसले में इस बात को रेखांकित किया कि जबलपुर में की गई प्रारंभिक जांच में इन अधिकारियों के खिलाफ किसी भी अपराध का साक्ष्य नहीं मिला था। एकलपीठ ने पाया कि जबलपुर की जांच रिपोर्ट में अधिकारियों को दोषमुक्त पाए जाने के बावजूद, रीवा के तत्कालीन आईजी गाजीराम मीणा के हस्तक्षेप और निर्देश पर कटनी में यह मुकदमा दर्ज किया गया था। इस पर न्यायालय ने कहा कि जिस स्थान पर कथित घटना हुई थी, वह आईजी गाजीराम मीणा के अधिकार क्षेत्र से बाहर था। इस तरह के क्षेत्राधिकार-विहीन निर्देश और उसके बाद की पुलिस कार्यवाही गंभीर संदेह पैदा करती है। एकलपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता (रेलवे अधिकारी) कथित घटना के समय अपनी सरकारी ड्यूटी पर तैनात थे। ऐसी स्थिति में, सीआरपीसी की धारा 197 के तहत उनके खिलाफ अभियोजन शुरू करने से पहले सक्षम सरकारी मंजूरी लेना अनिवार्य था, जिसका इस मामले में पालन नहीं किया गया। न्यायालय ने इन सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, अभियोजन की मंजूरी के बिना दर्ज किए गए इस मामले को कानून के खिलाफ मानते हुए तीनों विजिलेंस अधिकारियों के खिलाफ कटनी जीआरपी में दर्ज आपराधिक मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया। मामले में रेलवे विजिलेंस अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय शंकर रायजादा और अंजना श्रीवास्तव ने पक्ष रखा।

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