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मुंबई। मशहूर स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा एक बार फिर केंद्र सरकार के साथ कानूनी जंग के मैदान में हैं। कामरा ने बॉम्बे हाईकोर्ट में 2025 के आईटी संशोधनों और सहयोग पोर्टल की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। कामरा का दावा है कि इन नए नियमों ने एक साधारण पुलिस अधिकारी को इंटरनेट का भगवान बना दिया है। अब कोई भी पुलिसकर्मी किसी भी सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने का आदेश दे सकता है, जो सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने जैसा है।
सुनवाई के दौरान कामरा के वकील ने अदालत में एक चौंकाने वाला उदाहरण पेश किया। उन्होंने बताया कि हाल ही में एक यूजर का पोस्ट सिर्फ इसलिए हटा दिया गया क्योंकि उसने एक मुख्यमंत्री के दावोस दौरे पर राजनीतिक टिप्पणी की थी। पुलिस ने इसे आपत्तिजनक करार दिया। कामरा की याचिका में तर्क दिया गया है कि सहयोग पोर्टल के जरिए पुलिस बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया या कोर्ट ऑर्डर के कंटेंट टेकडाउन करवा रही है। यह नियम पुलिसकर्मियों को यह तय करने का अधिकार दे रहा है कि क्या सही है और क्या गलत, जो कि पूरी तरह असंवैधानिक है। यह मामला डिजिटल अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक टेस्ट केस बन गया है। अगर हाईकोर्ट पुलिस की इन शक्तियों पर लगाम नहीं लगाता, तो भविष्य में सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को पुलिस के एक इशारे पर खामोश किया जा सकेगा। कुणाल कामरा की दलील है कि इंटरनेट पर लोकतंत्र को बचाने के लिए इन नियमों को रद्द करना जरूरी है। अब सबकी नजरें बॉम्बे हाईकोर्ट पर हैं, जो यह तय करेगा कि भारत के डिजिटल नागरिक स्वतंत्र हैं या वे पुलिस की ऑनलाइन सेंसरशिप के गुलाम बन चुके हैं।

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