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जबलपुर। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति द्वारकाधीश बसंल की एकलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि आपराधिक प्रकरण में चार्ज तय करने के आदेश बिना सोचे-समझे जारी नहीं किये जा सकते। ट्रायल कोर्ट चार्ज तय करते समय विस्तृत कारण बताने मजबूर नहीं है परंतु यह उल्लेख करना आवश्यक है कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री के आधार पर अपनी राय बनाई है। दरअसल भोपाल के बैारसिया थानान्तर्गत युवती की शिकायत पर बलात्कार के तहत अपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता संजय जाटव की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि पीडि़त की शिकायत के अनुसार प्रकरण के मुख्य आरोपी मनोज रैकवार को वह बचपन से जानती थी और दोनों एक दूसरे से प्यार करते थे। मनोज ने शादी का झांसा देकर उसका दैहिक शोषण किया। इसके बाद शादी से इंकार कर दिया था। पीडि़त का आरोप है कि याचिकाकर्ता मुख्य आरोपी का दोस्त है और उसे सभी बातों की जानकारी थी। आरोप है कि वह दोनो के संबंध में परिजनों को बताने की धमकी देते हुए पीडि़ता पर बात करने तथा शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डालता था। आवेदक की ओर से तर्क दिया गया कि उक्त धारा के तहत चार्ज फ्रेम किये जाने पर उसने ट्रायल कोर्ट में आवेदन दायर किया था। उसके खिलाफ ऐसे कोई साक्ष्य नहीं है कि उसे प्रकरण में सह आरोपी बनाया जाये। इसके अलावा दोनों के खिलाफ अलग.अलग प्रकरण दर्ज किये जाने चाहिये। ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को निरस्त करते हुए अपने आदेश में कहा था कि आरोपी के द्वारा पीडि़त को धमकी देना अपेक्षित है, ऐसी स्थिति में कार्यवाही के पर्याप्त आधार है। उक्त आदेश के खिलाफ उसने अपील दायर की थी, जिसे खारिज किये जाने के कारण उक्त क्रिमिनल रिवीजन दायर की गयी है। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि चार्ज तय करने के विवादित ऑर्डर में ऊपर बताई गई तय कानूनी स्थिति का पालन निचली अदालत ने नहीं किया है। विवादित ऑर्डर को रद्द करते हुए नये सिरे से विचार करने के लिए इसे निचली कोर्ट को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

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