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पति की तलाक याचिका कुटुंब न्यायालय से खारिज
जबलपुर। कुटुम्ब न्यायालय के तृतीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश मुकेश कुमार दांगी ने पति द्वारा प्रस्तुत तलाक की याचिका को निरस्त कर दिया क्योंकि पति ने पत्नी पर बिना किसी आधार के व्यभिचार के आरोप लगाये थे। शुभम (काल्पनिक नाम) हर्षा (काल्पनिक नाम) का विवाह वर्ष 2017 में हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था, दोनों का एक पुत्र भी है। शुभम एवं उसके परिजनों ने हर्षा के साथ कई तरह के घरेलू हिंसा एवं प्रताड़ना के कृत्य किये जिस पर हर्षा अपना परिवार बचाने की खातिर सब कुछ सहती रही। कोरोनाकाल में उसके पिता की मृत्यु जबलपुर में हो गई, परिणामस्वरूप हर्षा को मायके जाकर अपनी मां की देखरेख करने के लिए जबलपुर में कुछ ज्यादा रूकना पड़ा, जिस पर शुभम और उसके परिजनों में उसकी मां नाराज हो गये और उन्होंने हर्षा की मां को नरसिंहपुर बुला लिया और उसे व उसके नाबालिग पुत्र सहित उसका समस्त स्त्रीधन छुडाकर मई 2021 में ससुराल वाले घर से निकाल दिया। हर्षा अपने नाबालिग पुत्र सहित अपने मायके जबलपुर में रहकर गृहस्थी पुनः बसाने के प्रयास एवं शुभम द्वारा आकर ले जाने का इंतजार करने लगी, लेकिन शुभम ने कुटुम्ब न्यायालय नरसिंहपुर में हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत क्रूरता एवं परित्याग के आधार पर विवाह विच्छेद का मामला वर्ष 2024 में प्रस्तुत कर दिया। उच्च न्यायालय जबलपुर ने उक्त मामले को हर्षा की याचिका पर कुटुम्ब न्यायालय जबलपुर में स्थानांतरित किया जिस पर तृतीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश मुकेश कुमार दांगी कुटुम्ब न्यायालय जबलपुर के समक्ष सुनवाई चली। कुटुम्ब न्यायालय जबलपुर ने मामले के विचारण उपरांत पाया कि शुभम ने अपनी याचिका में लिखा है कि हर्षा जारता की दशा में रह रही है, जिस पर शुभम ने कोई भी साक्ष्य नहीं दिया, न ही इसका कोई आधार बताया, बिना किसी आधार व साक्ष्य के पत्नि पर चरित्रहीनता के आरोप लगाना गंभीर किस्म की मानसिक क्रूरता है, अन्य न्यायदृष्टान्तों के अनुसार पति द्वारा पत्नी के चरित्र पर संदेह व्यक्त करने से अपमानजनक और कोई चीज नहीं हो सकती तथा शुभम ने ही हर्षा के साथ क्रूरता कारित की है। इस प्रकार शुभम को अपने ही दोष या निरयोग्यता का लाभ उठाने नहीं दिया जा सकता। याचिका में शुभम ने हर्षा पर क्रूरता के आरोप भी लगाये थे, जिसमें न्यायालय द्वारा साक्ष्य की न्यायिक समीक्षा करते हुए पाया कि शुभम ने विशेष रूप से ऐसा कोई भी कृत्य नहीं बताया जिससे हर्षा ने उसके साथ क्रूरता की हो। मायके मां से मिलने जाना या घर का खाना न बनाना या खाना बनाने में कुशल न होना कोई क्रूरता नहीं है। इस प्रकार न्यायालय द्वारा शुभम की तलाक की याचिका निरस्त कर दी। हर्षा की ओर से आनन्द चावला, एडवोकेट ने पैरवी की।

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