
नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई के दौरान धार्मिक अधिकारों और संवैधानिक सीमाओं पर अहम बहस हुई। सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन देखने वाले त्रावणकोर देवस्थनम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि शीर्ष अदालत को धार्मिक मान्यताओं की सही-गलत की व्याख्या नहीं करनी चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी धर्म की प्रथा उस समुदाय की आस्था से तय होती है, न कि न्यायिक मानकों से होती है।
वकील सिंघवी ने कहा कि धर्म मूल रूप से एक सामूहिक विश्वास है, इसलिए कुछ व्यक्तियों के अधिकार पूरे समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर हावी नहीं हो सकते। उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक अधिकारों पर रोक केवल विधि (कानून) के माध्यम से ही लग सकती है, न कि केवल सरकारी आदेशों या निर्देशों से रोक लगा सकते है। यदि बिना कानून के हस्तक्षेप हुआ, तब इससे सरकार को मनमाने ढंग से धार्मिक स्वतंत्रता में दखल देने का मौका मिल सकता है।
इस मामले की पृष्ठभूमि में केरल हाईकोर्ट का 1991 का फैसला है, इसमें 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस प्रतिबंध को भेदभावपूर्ण बताकर हटा दिया। इसके बाद पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर कई संवैधानिक प्रश्नों पर अब विस्तृत बहस हो रही है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने कहा कि यदि सभी को मंदिर में प्रवेश की अनुमति है, तब अंदर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि अलग-अलग जातियों को अलग स्थानों पर बैठाकर भोजन कराना असमानता का प्रतीक है। इस पर सिंघवी ने जवाब दिया कि कुछ धार्मिक प्रथाएं ऐसी हो सकती हैं, जिसमें दर्शन या पूजा के तरीके अलग हों, और हर स्थिति में कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
सुनवाई के दौरान सिंघवी ने तर्क दिया कि अदालत धार्मिक प्रथाओं को अपनी व्याख्या के आधार पर बदल नहीं सकती, यदि वे किसी धर्म का स्थापित और मान्य हिस्सा हैं। हालांकि, यदि कोई प्रथा कानून के विरुद्ध हो या पूरे समुदाय द्वारा मान्य न हो, तब उस पर रोक लग सकती है।
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश ने सवाल उठाया कि सामाजिक सुधार से जुड़े कानून, जैसे हिंदू उत्तराधिकार कानून, किस आधार पर बनाए गए। वहीं, आर्टिकल 15(3) के तहत महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान लागू होने की संभावना पर भी चर्चा हुई। इस पर मंदिर के वकील सिंघवी ने चेतावनी दी कि यदि अदालतें यह तय करने लगें कि कौन-सी धार्मिक प्रथा आवश्यक है और कौन-सी नहीं, तब न्यायपालिका धर्म के मामलों में अत्यधिक हस्तक्षेप करने लगेगी, जिसकी कोई स्पष्ट सीमा नहीं होगी। उन्होंने उदाहरण के तौर पर जैन दिगंबर साधुओं की परंपरा का उल्लेख किया, जो सामान्य सामाजिक दृष्टि से अलग हो सकती है, लेकिन उनके धर्म का अभिन्न हिस्सा है। अंत में न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि इस मामले में “संवैधानिक नैतिकता” के बजाय “सार्वजनिक नैतिकता” का पहलू भी महत्वपूर्ण रहेगा। यह पूरा मामला धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और न्यायिक सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को दर्शाता है।
