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डॉ. प्रांशी अग्रवाल
मनोचिकित्सा रेजिडेंट डॉक्टर
(चिरायु हॉस्पिटल, भोपाल)

छात्रों के लिए:
पहले अपनी भावनाओं को स्वीकार करें, फिर संभालें
रिज़ल्ट के बाद उदासी होना, घबराहट महसूस होना, बार-बार वही बातें सोचना और फिर दिल की धड़कन तेज होना — ये सभी प्रतिक्रियाएं बिल्कुल सामान्य हैं। सबसे पहले यह समझना और स्वीकार करना ज़रूरी है कि ये भावनाएं गलत नहीं हैं — इन्हें दबाने के बजाय स्वीकार करना ही पहला कदम है।
ऐसे समय में कई बार “ऑल-या-नन थिंकिंग” हावी हो जाती है — जैसे “अगर अच्छे नंबर नहीं आए तो सब खत्म हो गया।” खुद से पूछें — क्या सच में सब खत्म हो गया है, या यह सिर्फ एक मुश्किल समय है?
अपने विचार को संतुलित करें — “इस बार उम्मीद के अनुसार नहीं हुआ, लेकिन आगे सुधार का मौका है।”
घबराहट कम करने के लिए कुछ सरल तरीके अपनाए जा सकते हैं।
गहरी सांस लेने की तकनीक (बॉक्स ब्रीदिंग) इसमें मददगार है — 4 सेकंड तक सांस लें, 4 सेकंड तक रोकें, फिर 4 सेकंड में धीरे-धीरे छोड़ें, और फिर 4 सेकंड रुकें। इस पूरे चक्र को 4–8 बार दोहराएं।
इसके अलावा हाथ में बर्फ का टुकड़ा रखना या ठंडे पानी से चेहरा धोना भी शरीर को जल्दी शांत करने में मदद करता है। ये सभी अलग-अलग तरीके हैं, जिनमें से कोई भी अपनाया जा सकता है।
माइंडफुल वॉकिंग और माइंडफुल ईटिंग जैसी तकनीकें भी मन को वर्तमान में लाने में सहायक होती हैं।
सबसे जरूरी — अपनी भावनाओं को अपने तक सीमित न रखें। जो भी आप महसूस कर रहे हैं, उसे किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करें — दोस्त, कज़िन या माता-पिता।

अभिभावकों के लिए: प्रतिक्रिया नहीं, भरोसा और साथ दें
रिज़ल्ट के समय बच्चों से ज्यादा असर अभिभावकों के व्यवहार का होता है। इस समय बच्चों को यह महसूस कराना बहुत ज़रूरी है कि उनका मूल्य केवल अंकों से नहीं है।
बच्चों से स्पष्ट कहें —
“तुमने मेहनत की, हमें उस पर गर्व है। आगे जो भी निर्णय हम लेंगे, हम हर स्थिति में तुम्हारे साथ हैं। कभी यह मत सोचो कि हम तुमसे खुश नहीं हैं।”
यह सही समय है बच्चों को यह सिखाने का कि जीवन में सबसे ज्यादा महत्व मेहनत का है, केवल परिणाम का नहीं।
बच्चे को अकेला न छोड़ें, उसके साथ समय बिताएं, उसे रोज़मर्रा की गतिविधियों में शामिल करें और उसकी बात बिना टोके सुनें। किसी के सामने उसकी आलोचना करने से बचें।
भावनाओं को व्यक्त करने की आदत विकसित करें। यह समय समझने का है, डांटने का नहीं।

समाज के लिए: संवेदनशील बनें, तुलना से बचें
रिज़ल्ट के बाद समाज की प्रतिक्रिया भी बच्चों पर गहरा असर डालती है। बार-बार फोन करके “कितने नंबर आए?” पूछना या तुलना करना अनजाने में दबाव बढ़ाता है।
अगर कोई बच्चा खुश होगा, तो वह खुद अपनी खुशी साझा करेगा। इसलिए अनावश्यक सवाल और ताने देने से बचें।
हर बच्चा अलग होता है — उसकी सीखने की गति और उसकी प्रतिभा भी अलग होती है।
जैसे एक मछली को पेड़ पर चढ़ने से नहीं आंका जा सकता और एक पक्षी को तैरने से नहीं, उसी तरह हर बच्चे को एक ही पैमाने से नहीं परखा जा सकता।

महत्वपूर्ण संकेत (छात्र और अभिभावक दोनों ध्यान दें):
अगर बच्चा बहुत ज्यादा उदास रहने लगे, बार-बार वही बातें सोचता रहे, नींद या भूख में बदलाव हो, पहले जिन चीजों में रुचि थी उनमें रुचि कम हो जाए, ऊर्जा कम लगे, या खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आएं — तो इसे नजरअंदाज न करें।
ऐसी स्थिति में तुरंत किसी मनोचिकित्सक से संपर्क करें।
जरूरत पड़ने पर आप भारत सरकार की मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन Tele-MANAS (14416 / 1-800-891-4416) पर भी संपर्क कर सकते हैं।


डॉ. प्रांशी अग्रवाल
मनोचिकित्सा रेजिडेंट डॉक्टर
(चिरायु हॉस्पिटल, भोपाल)

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