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विश्वविद्यालयों में मुक्त विचार और कठिन सवालों के लिए जगह होनी चाहिए

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि छात्रों को केवल इसलिए धमकाया या दंडित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्होंने पद पर बैठे अधिकारियों से अलग विचार जाहिर किए हैं। जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि सवाल पूछने का अधिकार लोकतांत्रिक नागरिकता का मूल तत्व है, यह अवज्ञा का कृत्य नहीं, बल्कि नागरिकता, स्वतंत्रता और संवैधानिक जिम्मेदारी की अनिवार्य अभिव्यक्ति है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सवाल पूछने पर छात्रों को डराना या उन्हें सजा देना संविधान के खिलाफ है और यह सत्ता व पद का दुरुपयोग है। विश्वविद्यालयों में मुक्त विचार और कठिन सवालों के लिए जगह होनी चाहिए। जस्टिस भुइयां ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि सभी लोग एक ही तरह सोंच रहे। संविधान विभिन्न विश्वासों,विचारों और मान्यताओं वाले लोगों को समान गरिमा के साथ रहने और लोकतांत्रिक जीवन में भाग लेने का ढांचा देता है। मतभेद होना स्वाभाविक हैं और इन्हें स्वीकार करना जरूरी है, क्योंकि असहमति के बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ ही समाप्त होता है।
जस्टिस भुइयां ने असहिष्णुता को संविधान की मूल भावना के विपरीत बताया, जो एक प्रकार की हिंसा बन सकती है। उन्होंने कहा कि बुद्ध और गांधी की भूमि भारत में हिंसा और असहिष्णुता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने आह्वान किया कि स्वतंत्रता और विविधता का सम्मान करने वाले लोकतांत्रिक समाज की संस्कृति विश्वविद्यालयों से शुरू होनी चाहिए, जहां छात्र स्वतंत्र रूप से सोचें और स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाएं। कानून के क्षेत्र में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां सत्ता का इस्तेमाल व्यक्तिगत अधिकारों के साथ संतुलित होता है।
उनकी ये टिप्पणियां हैदराबाद स्थित नालासर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के हालिया विवाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। वहां छात्रों की आपत्ति पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कार्रवाई की थी, इसके बाद में भारी विरोध और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद वापस लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम न उठाने का निर्देश दिया था।

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