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कोर्ट ने कहा- सिर्फ वर्दी पहनने से नागरिकों की स्वतंत्रता से खिलवाड़ नहीं कर सकते

बेंगलुरु । कर्नाटक हाईकोर्ट ने व्हाइटफील्ड पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में लेने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए व्हाइटफील्ड डिवीजन के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) सैदुलु अदावथ को तलब कर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि पुलिस नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कानून के विपरीत सीमित नहीं कर सकती। कोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक (डीजीपी-आईजीपी) को सभी रैंकों के पुलिसकर्मियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने हिंदू राष्ट्र समन्वय समिति के मोहन गौड़ा की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि यदि पुलिसकर्मी अवैध गिरफ्तारी या हिरासत में शामिल पाए जाते हैं तो उनके पद या रैंक की परवाह किए बिना अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। ऐसे मामलों को अदालत के संज्ञान में लाए जाने पर संबंधित पुलिसकर्मियों पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। मामला स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा के शो के रद्द होने से संबंधित एक फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज केस से जुड़ा है। पुलिस ने मोहन गौड़ा के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया था। पोस्ट में शो रद्द होने को ‘हिंदू एकता की जीत’ बताया गया था। समिति की ओर से व्हाइटफील्ड में शो की अनुमति नहीं देने की मांग को लेकर पुलिस से शिकायत भी की गई थी।
अदालत ने पाया कि पुलिस ने 4 अगस्त को रात करीब 2 बजे मामला दर्ज किया। इसके अगले दिन दो सब-इंस्पेक्टर और दो कांस्टेबल उडुपी पहुंचे, जहां याचिकाकर्ता मौजूद था। पुलिस उसे उसकी कार में व्हाइटफील्ड ले आई। अदालत ने इस कार्रवाई के तरीके पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने पाया कि पुलिस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर पुलिस ने याचिकाकर्ता को 5/6 अगस्त 2026 की तारीख वाला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिया। खास बात यह है कि इस नोटिस में उसे अगले तीन दिनों के भीतर पूछताछ के लिए पेश होने को कहा गया था।
कोर्ट ने इसे गंभीर उल्लंघन माना, क्योंकि नोटिस दिए जाने से पहले ही याचिकाकर्ता पुलिस की हिरासत में था। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब नोटिस में व्यक्ति को तीन दिन का समय दिया गया था तो पुलिस को उसे उडुपी से पकड़कर व्हाइटफील्ड लाने की जरूरत क्यों पड़ी। सुनवाई के दौरान डीसीपी ने कहा- याचिकाकर्ता के स्वेच्छा से अपनी निजी कार से व्हाइटफील्ड पुलिस स्टेशन आने की बात कही। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उसे परिणाम भुगतने की चेतावनी देकर लाया गया था और दो सब-इंस्पेक्टर व दो कांस्टेबल भी उसकी कार में साथ आए थे। बाद में डीसीपी ने कहा, कि याचिकाकर्ता फोन नहीं उठा रहा था, इसलिए पुलिस को उडुपी जाना पड़ा। इस पर अदालत ने कहा कि जब नोटिस में ही पेश होने के लिए तीन दिन का समय दिया गया था तो तत्काल उसे हिरासत में लेने की कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।
कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि “सिर्फ वर्दी पहनने के कारण आप नागरिकों की स्वतंत्रता को हल्के में नहीं ले सकते।” अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों के अनुरूप नहीं थी, जिनमें सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर आपराधिक कार्रवाई को लेकर दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

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