
इन्दौर । उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने वित्तीय अनियमितता के मामले में निलंबित उज्जैन जनपद की पूर्व सीईओ सबीना निनामा को बरी करते हुए कहा कि विभाग में वित्तीय अनियमितताओं के समय केवल पद पर मौजूद रहने से कोई अधिकारी तब तक अपराधी नहीं बन जाता, जब तक कि उसके खिलाफ आपराधिक नीयत और व्यक्तिगत अवैध लाभ के ठोस सबूत न हों। कोर्ट ने पूर्व सीईओ सबीना निनामा के खिलाफ दी गई अभियोजन स्वीकृति को भी अवैध मानते कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के नियमों को ताक पर रखकर जांच की गई। नियमों के अनुसार, डीएसपी स्तर के अधिकारी ही ऐसे मामलों की जांच करते हैं, लेकिन इस मामले में पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा जांच की गई। अभियोजन मंजूरी देने वाले मुख्य अधिकारियों को कोर्ट में पेश नहीं किया गया। इससे अभियोजन स्वीकृति ही अवैध है।
ज्ञात हो कि सबीना निनामा, उज्जैन जनपद पंचायत में 2002 से 2003 के बीच सीईओ थीं। 2005 में जिला कलेक्टर उज्जैन के निर्देश पर गठित जांच कमेटी ने खनिज परिवहन से जुड़ी 110 ट्रांजिट पासबुकों के लापता होने, 26 खदानों के लीज समझौतों को समय पर निष्पादित न करने और विज्ञापन भुगतान में कथित धांधली को लेकर तत्कालीन अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया था। थाना माधव नगर, उज्जैन में मामला दर्ज होने के बाद जांच ईओडब्ल्यू को सौंप दी गई। ईओडब्ल्यू ने इसे भ्रष्टाचार और 34.38 लाख रुपए की राजस्व हानि बताते हुए निनामा को मुख्य साजिशकर्ता मानकर कोर्ट में चालान पेश किया था। 27 फरवरी 2018 को जिला कोर्ट ने उन्हें सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की थी। कोर्ट में तर्क दिया कि तत्कालीन लेखाकार बाबूलाल शर्मा की मौत हो चुकी थी, जबकि दूसरे लेखाकार अनंत सिंह बैस को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। अधिकारी डीडी त्रिपाठी को दोषी बताया गया, उन्होंने निनामा के साथ कभी एक ही कार्यालय में काम तक नहीं किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई सह-आरोपी बचा ही नहीं और न ही कोई पूर्व सहमति सिद्ध हुई तो आपराधिक साजिश का आरोप बेबुनियाद है। हाईकोर्ट ने आदेश में उल्लेख किया कि ईओडब्ल्यू ने यह मान लिया कि लापता पासबुकों का ठेकेदारों द्वारा दुरुपयोग किया गया, लेकिन जांच ! में दुरुपयोग साबित नहीं हुआ। राजस्व की कथित हानि काल्पनिक आंकड़ों पर आधारित थी। फाइलों की मॉनिटरिंग करना लेखाकारों का काम था। निनामा से पर्यवेक्षण में कोई कमी रह भी गई तो उसे । प्रशासनिक लापरवाही माना जा सकता है। इसके लिए उन्हें विभागीय जांच में दोषमुक्त किया जा चुका है। आपराधिक इरादे के बिना प्रशासनिक चूक को भ्रष्टाचार का नाम नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने निनामा को भ्रष्टाचार और साजिश के आरोपों से बरी करने के साथ उनके द्वारा जमा की गई जुर्माने की राशि वापस करने के आदेश दिए है।
