
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ किया है कि व्यापारियों को हमेशा मुफ्त यूपीआई लेनदेन की सुविधा का स्थायी भरोसा कभी नहीं दिया गया था। सरकार ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट(एमडीआर) लगाने के अपने प्रस्ताव का बचाव किया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में सरकार ने दलील दी कि शून्य एमडीआर व्यवस्था को जारी रखने का कोई विशेष आश्वासन नहीं था। यह व्यवस्था सरकार के विवेक पर निर्भर सब्सिडी थी, अनिवार्य नहीं। केंद्र ने चार नवंबर को दाखिल हलफनामे में बताया कि एमडीआर की संशोधित व्यवस्था पर इसे लागू करने से काफी पहले विचार शुरू हो गया था और संबंधित पक्षों से चर्चा भी हुई थी।
यह जवाब वकील अंजन दत्ता की जनहित याचिका के संबंध में दिया गया है, जिसमें संशोधित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(जी) के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। इसके जवाब में, केंद्र ने कहा कि एमडीआर की संशोधित व्यवस्था कारोबारियों के व्यवसाय करने के अधिकार पर कोई अनुचित पाबंदी नहीं लगाती। सरकार के मुताबिक, संविधान यह गारंटी नहीं देता कि कारोबार से जुड़ी सुविधाएं हमेशा मुफ्त ही उपलब्ध कराई जाएंगी। सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी शुल्क के कारण कारोबारी के मुनाफे में कमी आना अपने आप में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है और कारोबारी एमडीआर का बोझ ग्राहकों पर भी नहीं डाल सकते। सरकार ने लेनदेन की रकम, भुगतान के तरीके और कारोबारी श्रेणी के आधार पर अलग-अलग व्यवस्था को उचित ठहराया। 2,000 रुपये की सीमा इसलिए तय की गई है ताकि आम खुदरा लेनदेन और छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। केंद्र ने दलील दी कि एमडीआर न तो सरकार का टैक्स है और न ही सरकारी फीस। यह एक कारोबारी भुगतान है, जिसे बैंक और व्यापारी के बीच हुए समझौते के तहत काटा जाता है।
सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अंजन दत्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए संशोधित एमडीआर व्यवस्था पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन केंद्र सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। एनपीसीआई ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल कर प्रस्तावित शुल्क का बचाव किया है। उसके अनुसार, एनपीसीआई का असर पी टू एम लेनदेन के केवल एक छोटे हिस्से पर पड़ेगा, जिससे लगभग 96 प्रतिशत लेनदेन अप्रभावित रहेंगे। सरकार ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बनाए रखने के लिए स्थायी वित्तपोषण मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया। शून्य एमडीआर व्यवस्था के तहत, वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच बैंकों को 8,730 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन दिए गए थे, जो अनुमानित सालाना परिचालन लागत (20,700 करोड़ रुपये) का एक छोटा हिस्सा ही था।
