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बॉम्बे हाईकोर्ट ने सजा रद्द करने से किया इनकार
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक पूर्व सैन्य अधिकारी की जेल की सजा को रद्द करने से इनकार कर दिया और कहा है कि एक नाबालिग पीड़ित भी ‘बुरे स्पर्श’ को महसूस कर सकती है। एक पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल को 11 वर्षीय लड़की के यौन उत्पीड़न के लिए कोर्ट मार्शल द्वारा दी गई पांच साल की जेल की सजा को रद्द करने से हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति नीला गोखले की पीठ ने कहा कि अदालत में लड़की द्वारा कही गई बातों से यह स्पष्ट था कि उसके पिता के कमरे से चले जाने के बाद आरोपी ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया। दरअसल फरवरी 2020 में सेना का एक कांस्टेबल अपनी बेटी और छोटे बेटे को आरोपी से मिलने के लिए उसके कमरे पर ले आया। इस दौरान लड़की के पिता के कमरे से चले जाने के बाद आरोपी ने कांस्टेबल की बेटी की जांघ को छुआ और उससे चुंबन मांगा। लड़की ने तुरंत अपने पिता को फोन किया और उन्हें घटना की जानकारी दी। इसके बाद शिकायत दर्ज कराई गई। मार्च 2021 में, सेना की जीसीएम ने नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के लिए आरोपी को पोक्सो अधिनियम के तहत यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया था और उसे न्यूनतम पांच साल जेल की सजा सुनाई थी। पूर्व सैन्य अधिकारी ने हाई कोर्ट में अपनी याचिका में दावा किया है कि लड़की को छूने का उसका कोई गलत इरादा नहीं था और उसने दादा/पिता के प्यार के कारण लड़की से चुंबन मांगा था। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को मानने से इनकार करते हुए कहा कि आरोपी के बुरे स्पर्श को पहचानने संबंधी पीड़िता के बयान पर विश्वास किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि लड़की आरोपी से पहली बार मिल रही थी और उसके लिए उसकी जांघ को छूने तथा हाथ पकड़ने और उसकी हथेलियां पढ़ने के बहाने उसे चूमने का अनुरोध करने का कोई कारण नहीं था। हाई कोर्ट ने कहा, हमें याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं मिला है और इस मामले में जीसीएम और एएफटी के निष्कर्षों में कोई त्रुटि नहीं है।

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