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श्रीमती गायत्री तिवारी ने बाल विवाह रुकवाए और पढ़ाई के लिए बेटियों को किया प्रेरित

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती गायत्री तिवारी ने अपने कर्तव्य से लिख दी सफलता की इबारत

छतरपुर। एक महिला अगर ठान ले तो अपने परिवार और समाज के उत्थान के कुछ कर सकती है। साथ ही अपने हुनर का सदुपयोग कर जीवंत सफलता की इबारत लिख सकती है। कुछ ऐसा ही छतरपुर जिले के राजनगर ब्लॉक में देखने को मिला। यह सच्ची कहानी है आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती गायत्री तिवारी की जो ग्राम पहाड़ी की निवासी हैं। इनको जन्म से डेढ़ वर्ष की उम्र में ही पोलियो हो गया था। लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इस बाधा को अपनी सफलता की ढाल बनाकर अपनी पढ़ाई को जारी रखा। 12वीं तक की शिक्षा लेने के बाद उनका विवाह खजुराहो में हो गया। यहां वह 2007 में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बन गई और कार्यकर्ता के पद पर रहते हुए वह महिला बाल विकास विभाग में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं इसके उदाहरण अनेकों हैं, जिसमें गर्भवती कौशल्या कुशवाहा का हीमोग्लोबिन मात्र 7 पॉइंट था, वे आयरन सुक्रोज लगवाने के लिए तैयार नहीं थी, गायत्री की समझाइस के बाद उन्होंने आयरन सुक्रोज लगवाया और 4 किलोग्राम की बच्ची को जन्म दिया। धात्री माता सीमा कुशवाहा अपनी तीन माह की बेटी को ऊपर का दूध देने लगी थी जिससे बच्ची का वजन कम होने लगा था, गायत्री के लगातार 8 दिन प्रयास करने पर सीमा फिर से बच्ची को स्तनपान कराने लगी और बालिका 5 माह की होने पर वजन 7.6 किलोग्राम हो गया। बालिका निशा अहिरवार ने पांचवी के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, गायत्री की समझाइस के बाद बालिका ने पुनः कन्या शाला में प्रवेश लिया और आज वह बालिका कक्षा आठवीं में है। बालिका नेहा अहिरवार का 18 वर्ष के पहले विवाह होने से गायत्री ने ही उन्हें समझाइस देकर रोका।

गायत्री ने बताया कि खजुराहो के वार्ड क्रमांक 3 में कोई भी बच्चे कुपोषित नहीं हैं। ये समझाइस का ही परिणाम है। कुपोषित बच्चे होने पर पेरेंट्स एनआरसी में बच्चे को भर्ती कराने के लिए तैयार हो जाते है। जिसके बाद बच्चे स्वस्थ्य होकर खुशियां लेकर घर लौटते है। गायत्री ने महिला सशक्तिकरण इसी इबारत पेश की है जिससे कहा जा सकता है कि जहां चाह होती है वहां राह होती है। जीवन की कठिनियां उन्हें अपना कार्य करने से नहीं रोक पाई और इसी कारण वे अपने वार्ड के लोगों की अधिक से अधिक सेवा कर रही हैं।

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